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Saturday, April 2, 2016

नीड़

नीड़ माने सिर्फ,
घोंसला नहीं
नीड़ माने सिर्फ
बसेरा नहीं
नीड़ माने
माँ के आँचल तले
बसेरा है।
 धापी नीड़

‘धापी नीड़’
माने
माँ के आँचल तले बसकर
माँ की गोद में पलना है। 


जीवन-एक दृष्टिकोण

जीवन को समझना
उतना ही मुश्किल  है
जितना खुद को समझ लेना
हम चाहते क्या हैं?
हमें ही नहीं मालूम
क्या सारी दौलत,
सारी खुषी
सारी शौहरत
चाहत है हमारी,?
यदि नहीं,
तो खुद को समझें कैसे?
खुशी  के दो पल
यदि नहीं मिले हमें तो
सारी दौलत, शौहरत और खुशी 
किस काम की?
सहज, स्वाभाविक जीवन नहीं हमारा
तो जीवन किस काम का?


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