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Saturday, February 27, 2016

आज का इंसान

आज का इंसान

एक इंसान
अपने जिस्म के हजारों टुकड़े करके
अनुभव करने की कोषिष कर रहा है
दर्द को

खोज रहा है
ईमानदारी को
आखिर कहाँ छिपी है
इंसानियत?

हैरान है
खोजते-खोजते
दर्द 
गया कहाँ?

सोचने को मजबूर,
क्या आज के इंसान के लिए
दर्द की अनुभूति 
आवष्यक नहीं?

क्या अपने आप से गिरकर
जीना ही
आज के इंसान की 
इंसानियत है?

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