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Thursday, February 25, 2016

माँ की निगाहें

बच्चों की निगाहें
हरदम
शून्य में
निहारती रहती हैं
माँ को।

क्योंकि 
माँ की स्वप्निल निगाहें
हर लेती है 
सब दुखों को
बच्चों के।

उसकी याद में

सूर्यास्त का वक्त
समुद्र का छोर,
गुलषन की महक
प्रकृति,
अपनी सुन्दरता
बिखेर रही थी।

मैं उस वक्त
वहीं लेटा हुआ
प्रकृति की सुन्दरता को
निहार रहा था।

मन प्रफुल्लित
दिल खुष था
तभी पायल की
झंकार ने मुझे
अपनी ओर आकृष्ट किया।

मैं एकाएक चौंका !
दिल की धड़कन बढ़ने लगी,
जिस्म कांप उठा
जुबान रूक गयी।

और मेरी आँखे
उसे एक टक
यँू देखने लगी
जैसे मेरी मनचाही
मुराद पूरी हो गयी हो।

और मैं खुषी के मारे
उसकी बाँहों में बाहंे डालकर
वहीं एक ओर
लेट गया।

तभी मुझे लगा
वो भीग गयी
मैं उसके जिस्म से
पानी पोछने लगा

फिर एक बार
और चैंका
नींद से जागा
और देखा...

मैं जिसके जिस्म से 
पानी पोंछ रहा था,
वो, कोई मन चाही
मुराद नहीं थी।

बल्कि बिस्तर का एक छोर था,
जो उसकी याद में
मेरे आंसुओं से
भीग गया था। 



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