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Saturday, February 20, 2016

अनुभूति

यह मेरा सौभाग्य ही है कि मास्टरजी जिन्हें लेाग, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के नाम से जानते हैं, उनके सानिध्य में मैंने कई वर्ष व्यतीत किये। सन् 1948 में पहली बार मैंने मास्टरजी के दर्षन किये। मास्टरजी हिन्दी विषय के शिक्षक थे, उन्होंने मुझे भी पढ़ाया हैं मेरा यह भी सौभाग्य था कि मास्टरजी सन् 1955 में मेरी शादी की बारात में जिला-बालाघाट के कटंगी गए थे, तथा वहाँ रूके थे। मास्टरजी बहुत दिनों तक तो हमारे गाँव छुईखदान में भी रहे हैं। मास्टरजी की प्रेरणा से मैं हिन्दी साहित्य से जुड़ा रहा और मैंने साहित्यालंकार, शिक्षारत्न, आचार्य एवं हिन्दी विशारद की परीक्षा उत्तीर्ण की। मास्टरजी अत्यंत सरल स्वभाव के थे। सन् 2006 में मुझे बख़्शी सृजन पीठ एवं छत्तीसगढ़ शासन द्वारा बख्शी जी का शिष्य होने का पुरस्कार मिला।
मेेरा छोटा भाई नीलम, जिस कमरे में पढ़ाई करता था उसी कमरे में मास्टरजी दो दिन रूके थे। नीलम को सन् 1975-76 अर्थात उसके स्कूल के दिनों से ही लिखने का शौक था। कई बार उसने मुझे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर दिखाया और मैंने उसे साहित्य के बारे में मास्टरजी की उल्लेख करते हुए बताया था, कि मास्टरजी कितने सरल स्वभाव के उच्च केाटि के व्यक्तित्व के धनी थे। नीलम की कुछ कविताओं को देखने के बाद मैंने उसकी कविताओं में एक संदेश  देखा। माँ के बारे में उसके विचार हमनें उसके जीवन में अनुभव भी किये। 
मैं उसके अत्यंत उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ ।


भंवर लाल सांखला
 


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