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Friday, February 19, 2016

समर्पण

सृजन का अनुपम उपहार
‘‘माँ के श्रीचरणों’’ में
हमसफर की अविस्मरणीय प्रेरणा
एवं बिटिया की सुकोमल भावनाओं में।  

बाई का नज़रिया

हर इंसान अपनी आँखों से दुनिया देखता है। अपनी जुबां से मन के विचार व्यक्त करता है।
न्याय के मंदिर में हमेशा  एक-एक विधिक शब्दों में लम्बी-लम्बी जिरह होती है, हर केाई अपने अनुसार स्वत्व, कब्जा, चोरी, लूट, लापरवाही इत्यादि की व्याख्या करते चले जाता है, और अपनी परिभाषा देता है।
मेरे मन में कई बार यह विचार आता है कि मैं भी अपने मनोभावों को परिभाषित करूं। निगाहें मेरी, नजरिया माँ का, जेहन में रखकर मैंने कई परिभाषाएँ इस पुस्तक के माध्यम से पहली बार आपके समक्ष पेश  करने की साधारण सी कोशिश  की है। मेरी यही आशा  है कि मेरी कविता या यूं कहें मुक्तक को ईष्वर, कुल देवी श्री जेागमाया, श्री रानी भटियाणी माजीसा, आचार्य श्री नानेष, श्री रामेष, माँ-पिताजी, गुरू, भाई, बहन, हमसफर श्रीमती संजू सांखला और बेटी की प्रेरणा से मैंने स्वभाव के अनुसार हिंदुस्तान घूमते हुए प्रकृति के सानिध्य में जाकर व्यक्त किया है।
मैं अपनी बेटी कु.पूर्वी सांखला और कम्प्यूटर मास्टर प्रमोद अचिन्त्य का भी शुक्रगुजार हूँ .....जिन्होंने भी मुझे प्रेरणा दी ......अपने विचार को लोगों के सामने रखने की। मैं, समालोचक डाॅ. प्रवीण गुप्ता एवं यश  पब्लिकेशन का भी शुक्रगुज़ार हूँ ।

नीलम चंद सांखला


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