have faith in me and in my blog ....and.... i m sure u'll then start appreciating nature and small small things around yourself!!! so, FEEL FREE TO SUBSCRIBE & ENJOY!!!

Wednesday, April 6, 2016

नज़रिया

नज़रिया

तूने मुझे हाथ पकड़कर
चलना सिखाया
प्रथम गुरू बनकर
गुरू से मिलाया

अब बड़ा हो गया हूँ
मुझे तेरी जरूरत नहीं
दुनियादारी सीखकर
दौड़ने लगा हूँ

दुनियादारी देखकर
थक गया हूँ
बस! अब कुछ पल
ठहरना चाहता हूँ

माँ ! अपनी गोद में लेकर
मेरी सूरत
मेरी निगाहें
बदल दे !

नहीं चाहिए मुझे
दुनिया का नूर
माँ! बस अपनी निगाहों का नज़रिया दे दे!





रिश्ता 

रिश्ता
गैरों से बनाने में
जीवन लगाते हैं
रिश्तेदार  कल काम आएंगे

वक्त की धूप ने
जीवन की चमक को
धुँधली, क्या किया?
रिश्तेदारो  ने धूप में निकलना छोड़ दिया

अपनों की उपेक्षा का पाप
सर पर और जड़ा
गैर क्या,
अपनों से रिष्ते ना बना सका

गर रिष्ता बनाना है तुझे
पहले खुद से खुद का रिष्ता बना
अपनी हमसफर से रिष्ता बना
जीवन की खुशीया देने वाली गुडि़या से रिष्ता बना

गर चाहता है और रिष्ता बनाना
‘भारत माँ’ से रिष्ता बना
धूप आने पर, धूप में आयेगी
छाँव भी खुद साथ लाएगी।


Tuesday, April 5, 2016

चलना ही जीवन है

सिर्फ चलते चले जाओ....
हर कदम मंजिल करीब आयेगी

योजना बनाकर चलते चले जाओं....
एक कदम मंजिल और करीब आयेगी

बिना स्वार्थ के चलते चले जाओ...
हर कदम सफलता की मंजिल तक पहुंचायेगा

जीवन का एक कदम दूसरों के लिए बढ़ाओं
मंजिल में पहुँचना सार्थक हो जायेगा
राजा की खरोंच

दुर्घटना में 
इंसान कुचला गया
इंसान मर गया
भीड़ चली गई

मरने वाला
कोई राजा तो नहीं था
जो उसकी चीख
मौका परस्त लोगों को
कोठे में घुंघरू के बीच
सुनाई दे जाती

चापलूस !
राजा के दर्द की अनुभूति
अपने जिस्म को छीलकर
अहसास कराने से बाज न आते

यह लोभियों का बाजार है
यहाँ हर चीज बिकती है
रंक की चीख के आगे
राजा की खरोंच दिखती है 



Monday, April 4, 2016

नया वर्ष मंगलमय हो !

जीवन की रहा में
अपने
बहुत कम नज़र
आते हैं।
अपनत्व को बनाये रख
नववर्ष की रहा में
चलते चले जाइये
अपने ही, अपने
नज़र आयेंगे।
नया वर्ष शुभ हो

माँ की याद

अपनी निगाहों से हरदम
मेरा ख़्वाब सजाने वाली,
ख़्वाबों की दुनिया को
हकीकत बनाने वाली।

25 बरस पहले देखा था तुम्हें,
आज हर पल
मेरी निगाहों में
बसने वाली।

बरसों पहले गोद में तेरी
बिताये थे चंद लम्हें,
आज तेरी यादों की गोद में
हर-पल जिये जा रहा हूँ 

बरसों पहले
तुम्हारे हाथों से
माथे को सहलाने का
एहसास है मुझे,

यकीं नहीं तो 
देख ले ‘नीलम’
मेरे सर के ऊपर हरदम
माँ के हाथ का साया है। 
 

Sunday, April 3, 2016

अपरिग्रह

जो चीज
अपनी नहीं
उसका
मोह कैसा?

हिरण

जंगल के सन्नाटे में
चारों ओर खामोशी  है
खामोषी को चीरती
हिरन की उपस्थिति
बयां कर रही है
सजीवता
जंगल की।
पैसा

पैसा जोड़ने से जुड़ता नहीं
पैसा खर्च करने से कम होना नहीं
जहां जायज हो
वहां सौ रूपये खर्च कम है
जहां जायज न हो
वहां एक रूपये का खर्च व्यर्थ है
पैसा, पैसा बनाता है
जोखिम बिना पैसा नहीं बढ़ता
बिना लेखा के प्रगति नहीं
बिना योजना के भविष्य नहीं गढ़ता।




Saturday, April 2, 2016

नीड़

नीड़ माने सिर्फ,
घोंसला नहीं
नीड़ माने सिर्फ
बसेरा नहीं
नीड़ माने
माँ के आँचल तले
बसेरा है।
 धापी नीड़

‘धापी नीड़’
माने
माँ के आँचल तले बसकर
माँ की गोद में पलना है। 


जीवन-एक दृष्टिकोण

जीवन को समझना
उतना ही मुश्किल  है
जितना खुद को समझ लेना
हम चाहते क्या हैं?
हमें ही नहीं मालूम
क्या सारी दौलत,
सारी खुषी
सारी शौहरत
चाहत है हमारी,?
यदि नहीं,
तो खुद को समझें कैसे?
खुशी  के दो पल
यदि नहीं मिले हमें तो
सारी दौलत, शौहरत और खुशी 
किस काम की?
सहज, स्वाभाविक जीवन नहीं हमारा
तो जीवन किस काम का?


Friday, April 1, 2016

माँ के समान

जिस नारी की सूरत
जन्म देने वाली माँ की याद दिलाए
वह नारी भी
माँ के समान है।
धापी

धापी माने
सिर्फ धापना नहीं
धापी माने
‘ध’ से धन
‘प’ से पाना नहीं
धापी माने
‘ध’ से धरा अर्थात् धरती माँ
और
‘प’ माने पलना
मेरी निगाह में
धापी माने
माँ की गोद में पलना है। 








Thursday, March 31, 2016

मौन

ज्यादा बोलने से
ज्यादा खतरनाक है
बिल्कुल नहीं सुनना
सुनने की आदत
कम बोलना ही नहीं
मौन के करीब होती है।
आत्म-चिंतन

भीतर झांक कर देखना
खत्म करता है, अशांत  मन को
मन की शांति का यह अचूक तरीका
सदियों से मन के भटकाव को
रोकने का नायाब तरीका
जरा पहले क्यूं नहीं आया
बिना संदर्भ
ना मालूम क्यूं
अच्छी चीजें
धूल में दबे होने से रहा में राही को दिखती नहीं 
है। 
 

Wednesday, March 30, 2016

संम्भव 

‘हौसला’ हालात को
बौना बनाता है
धैर्य जीवन से
उलझन मिटाता है
संभव  जीवन को
जीना सिखाता है।

श्रीगणेश 

एक बार
दिल की बात
दिल से
श्रीगणेश  करके तो देखिए
कैसे विघ्नहर्ता
आपके विघ्न को
हरकर
एक दंत
एक लक्ष्य देख कर
गजराज
गज जैसी विषाल
सोच से
चार भुजाधारी
चंहु  ओर प्रकाश  बिखेर कर
लम्बोदर
लम्बी उम्र देखकर
आपके काम को
बिना विघ्न के
कैसे श्रीगणेश  
सम्पन्न कराते हैं।
 

Tuesday, March 29, 2016

साथी

साथ रहकर
परवाह करने से
बेहतर है
साथ रहने का
एहसास कराना
हक़ीकत

चाहत से
मिलती है जिंदगी
जिंदगी चाहत का नाम है
आज इंसान चाहत से दूर
मदहोश  होकर, पैसा बटोरने में,
चाहत की कब्र खेदकर
चाहत को दफनाने में
सारी जिंदगी गुज़ार देता है
होश  में तब आता
जब खुद को क़ब्र में पाता है। 



Monday, March 28, 2016

अतिक्रमण

अतिक्रमण इंसान हटाता है
भाई-चारा निभाता है
प्रकृति भाई-चारा देखती है
भाई को हटाकर, चारा समेटती है।
 विश्व जनसंख्या दिवस

हम एक से
सात अरब हो गए
प्रकृति हमें बोझ नहीं समझती
प्रकृति हमें अपनी खूबसूरती
जल, जमीन, जंगल
दिखाना चाहती है।
हम प्रकृति को बोझ समझ
जल, जमीन, जंगल लीलने लगे
प्रकृति हमें अपनी खूबसूरती नहीं
हमारी बनायी क़ब्रगाह दिखाना चाहती है। 


Sunday, March 27, 2016

अन्न-महिमा

बिना ज्यादा
अन्न उगाए
उसी अन्न से
हजारों भूखों के
पेट भरो
करो सिर्फ इतना
खाने के बाद
थाली
बिना अन्न के छोड़ो
 मध्यस्थता

पक्षकारों का फैसला
पक्षकारों की शर्तो पर
न्यायाधीष के हाथ
यही है,
मध्यस्थता का कमाल
कानून का भय

कानून का भय हो
किन्तु कानून से डरे नहीं
जो कानून तोड़े
वही कानून से डरे।





Saturday, March 26, 2016

एक उम्मीद-नया वर्ष

किस कदर
गुजरी जिंदगी
हमें याद नहीं

हमें ना गम
ना शिकवा
बीती जिंदगी का

माना लाख गलतियाँ
की हमने
सौ जख्म खाये

फिर भी
कोसों दूर रही
मंजिल हमसे !

आज इसी उम्मीद में
अपने आप को
नये वर्ष में ले जाऊँगा

अब हर पल नयी आषा के साथ बिताऊँगा
और कुछ कर दिखाऊँगा
मंजिल तक जरूर पहुँच जाऊँगा।


Friday, March 25, 2016

उपलब्धि

साधारण सी दिखने वाली
उपलब्धि भी
हमें  मंजिल के शिखर तक
पहुँचने  में
सहायक होती है
और राह में पड़ने वाले
अंधेरों को दूर करने में
बड़े प्रकाश  स्तम्भों की तरह
मदद करती है।

 ज्ञान

दुनिया में उतना ही ज्ञान नहीं
जितना हम जानते हैं
इस राज को जिसने
जान लिया
मानो ज्ञान को पहचान लिया।

विशाल भव-सागर में 
गोता लगाकर
जिसने ज्ञान को निकाल लिया
उसी ने ज्ञान को जान लिया। 



Thursday, March 24, 2016

एक बेटी तो होनी चाहिए !

अपनी बेटी के
जन्म दिन में
क्या उपहार दूं
उसे...

ईश्वर  ने मुझे
दुनिया के
सृजन का उपहार दिया है...

मेरे सारे उपहार
बौने हैं
विधाता के इस
उपहार के सामने...

बेटियों का अस्तित्व
बचाये रखना ही
सबसे बड़ा उपहार है
विधाता के लिए...

मैं खुशनसीब  हूं
ईश्वर  ने मुझे बेटी देकर
ईश्वर को धन्यवाद देने का
एक मौका दिया...

यही मेरा उपहार है
बेटी के लिए
ईष्वर उसकी खुषियां
सलामत रखे...


Wednesday, March 23, 2016

इंसानियत खतरे में

लूटेरे खुदा को लूट रहे हैं,
इंसान को लूटने से बचायें तो कैसे,

अपने, अपनों के खून के प्यासे हो गये हैं
गैरों की जान बचाएं तो, बचाएं कैसे?

खुद से खुद डरने लगा है
बीवी-बच्चे को बचायें तो कैसे?

गिरना इंसान की फितरत हो गई है,
इंसानियत को अब बचाएं तो कैसे?
माँ, तुम याद आती हो

माँ,
आज हर पल
याद आती रही
तेरी
कैसे
याद नहीं करता तुझे
जब नींद
मेरी पलक में थी ही नहीं
फिर कौन
मुझे अपनी गोद में
सुलाकर,
बालों में
अंगुलियाँ घुमाकर
नींद के
आगोश  में ले जाता




Tuesday, March 22, 2016

गुरू कृपा

पक्षियों को उड़ते देख
लगता है
जीवन उड़ रहा है
पहाड़ो को देख
लगता है
जीवन ठहर गया है
नदियों को बहता देख
लगता है
जीवन चल रहा है
माँ के प्यार को देख
लगता है
जीवन प्यार भरा है
अपनों के बदलते नज़रिया देख
लगता है,जीवन स्वार्थ भरा है
पत्नि का प्यार देख
लगता है
जीवन समर्पण भरा है
बिटिया की निगाहों में
स्नेह देख
लगता है
जीवन खुशियों  भरा है
पल-पल बदलते रिश्ते  देख
लगता है
जीवन छलावा भरा है
उम्र दर-उम्र बढ़ते देख
लगता है
जीवन नासमझी भरा है
बावन बरस में
गुरूवर आचार्य श्री नानेश  का
‘आत्मसमीक्षण’ अध्ययन कर
लगता है
जीवन कुछ समझ भरा है।


Monday, March 21, 2016

हौसाला

आज एक नन्हीं चिडि़या को
घरौंदे बनाते देखा

भरी बरसात में
तिनके चुनकर सँजोते देखा

चैखट में खड़े रहकर
मंजिल की ओर क़दम न बढ़ा सका

हर पल छाते को ढूंढने में
मन को भटकते देखा

तभी चिडि़या को
एक तिनका घरौंदे में और सँजोते देखा

माना कि मुराद पूरी नहीं हुई मेरी
किंतु क़दम को मंजिल की ओर बढ़ते देखा।


Sunday, March 20, 2016

खुशियाँ 

क्यूँ
हम
खुशियाँ  पाने
दर-दर
भटकते हैं,

प्रकृति
की गोद में
जाकर बैठो
और
देखो

कितनी
खुशियाँ
संजोये
बैठी है
हमारे लिए।



Saturday, March 19, 2016

फासला

गरीब और अमीर के बीच
उतना ही
फासला है,

जितना
जिन्दगी और मौत
के बीच।

अमीर जिन्दगी
चाहता है,
और गरीब मौत

किन्तु
ना अमीर जी पाता
और ना गरीब मर पाता।
हमसफ़र

मैंने
जीवन के सफ़र में
उस रोज से
तुम्हें 
अपना हमसफ़र
मान लिया है,
जब मैंने 
तुम्हें नहीं,
तुम्हारी
परछाई को देखा था।





Friday, March 18, 2016

जि़न्दगी

तेरे साथ जिन्दगी बिताऊँ
ऐसी मेरी किस्मत कहाँ?

तेरे बिना
जिन्दगी गुजारूँ
इतनी मेरी हिम्मत कहाँ?

तेरे बिना भी
तेरे साथ
जीना सिख लिया...

यकीं न हो तो
आकर देख ले पल भर
तेरे ख़्यालों के आगे
बौना बनाया है जीवन को।
 सीख

खुशी  में हर अपने
साथ होना चाहते हैं
न बुलाने पर
नाराज हो जाते हैं

गम में आने से
कतराते हैं
न आने के हजार
बहाने बनाते हैं

आज 
माँ की याद ने
मुझे
एक सीख दे दी है

चलने के लिए कारवां की नहीं
हौसले की जरूरत होती है
और मैं
अकेला चल पड़ा। 



Thursday, March 17, 2016

इंसानियत

इंसानियत के बिना
इंसान
शैतान कहलाता है।

इंसानियत ही
इंसान को
भगवान बनाती है।

प्रकृति की अद्भूत निगाहें

प्रकृति ने
‘आंवला’ और ‘तेंदू’
दोनों को
विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में दिया है

किन्तु 
आंवला को ज्यादा सुंदर
बनाया है,
तेंदू से

यदि तेंदू भी
सुंदर  होता,
आंवले की 
तरह तो
अमीर 
बेवजह
उसे भी
खरीद लाते

फिर 
गरीब
विटामिन-सी
कहाँ से पाते !

Wednesday, March 16, 2016

संबंध

इंसान ने जितना संबंध
भौतिकता से जोड़ा है,
उससे कहीं ज्यादा
अपनों से तोड़ा है।

सत्य का वास्तविकता से
उतना ही सम्बन्ध है,
जितना सम्बन्ध
जीवन का मृत्यु से।
शेरनी

इक्कीसवीं सदी में
बांधवगढ़ नेशनल पार्क में,
शेरनी के 
अस्तित्व से

बाईसवीं सदी में
इंसान के सुखद
अस्तित्व की कल्पना
की जा सकती है

क्योंकि पर्यावरण संतुलन
की जननी है
शेरनी। 




Tuesday, March 15, 2016

हक

किस-किस का
शुक्रिया अदा करूँ
किस-किस का
एहसां चुकाऊं

पहले ही मेरी
जिन्दगी
एहसानों के बोझ से
लद चुकी है।

तुम मुझे अपना
बनाकर
और ना एहसां
लादो मुझ पर

क्योंकि मरने के
बाद भी
मेरी मिट्टी पर
किसी और का हक़ होगा।
स्वयं के आकलन का तरीका

क्या खोया
महत्वहीन।

अफ़सोस !
ऐसा नहीं होता
ज्यादा पा लेता
ज्यादा महत्वहीन।

क्या बचा है
महत्वपूर्ण?
उसे लम्बे समय तक कैसे बचाएं
ज्यादा महत्वपूर्ण। 



Monday, March 14, 2016

छत्तीसगढ़ का वृन्दावन-छुईखदान

प्रकृति की
गोद में

मैकल की पहाडि़यों के करीब
बसा है, मेरा गाँव।

आओ, आज मैं तुम्हें
अपने गाँव के बारे में कुछ बताऊँ

अपने गाँव की हवा, पानी, मिट्टी का
कुछ कर्ज चुकाऊं।

कई रियासतों में एक सरल रियासत थी
छुईखदान,

राज किया बैरागियों ने
छुईखदान में,

शहीदों की नगरी है
छुईखदान,

भगवान श्रीकृष्ण के
मंदिर की बनावट को देखकर

अक्सर बुजुर्ग
कहा करते हैं

छत्तीसगढ़ का वृन्दावन है
छुईखदान।


Saturday, March 12, 2016

रफ़्तार

इन्सान जिस
रफ़्तार से
आसंमा की ओर
बढ़ रहा है,

उससे कहीं
तेज रफ़्तार से वह,
प्यार, दर्द और अपनापन
भूलता जा रहा है।
माँ का आँचल

माँ
सागर है प्यार का

माँ
दोस्तों की दोस्त है

माँ
दर्द हरने वाली दवा की खान है

माँ
जीवन का सच है

माँ
रौशनी  की राह है

माँ, के आँचल के कोने में
सागर सा प्यार है

माँ के आँचल में,
जन्नत की बहार है

सागर की शांत फिजा भी 
माँ के आँचल को तरसती है
कहीं ज्वार-भाटा उसे
अशांत ना कर दे।


Friday, March 11, 2016

सजा

किसी की
गलती की
सजा इतनी
न दे ऐ ‘नीलम’

कहीं उस बदनसीब
के पास पश्चाताप
के लिए दो वक्त,
भी न हो।

कल

कल के साथ
बात का अर्थ बदलता है

कल का वर्तमान
आज जो अतीत है

कल कुछ और कहता था
आज कुछ और बता रहा है

आज का वर्तमान
जो कल अतीत होगा

कल के वर्तमान को
कुछ और बताएगा।

Thursday, March 10, 2016

जीत

जीत
सिर्फ पा लेना
नहीं है,

यदि हमें
नया रास्ता
दिखे,

और हम
उस पर
चल पड़ते हैं,

तो यह भी
हमारी
जीत है।


साथ

मैं माँ के साथ रहा
27 बरस
माँ मेरे जे़हन में
अब भी
मेरे साथ है
क्या वे कम है?
माँ का साथ
मेरे लिए।

Wednesday, March 9, 2016

भ्रूण हत्या

विधाता ने प्रकृति की हर माता को
मातृत्व गुणों से नवाजा है,

इन्सान ही नहीं
पशु -पक्षी, कीट-पतंगों
हर एक में,
मातृत्व की झलक देखी जा सकती है।

विधाता ने इंसान को विवेक,
पशु-पक्षी
कीट-पतंगों से
कहीं ज्यादा दिया है।

इंसान मातृत्व की जननी
मादा भ्रूण को पहचान कर
नष्ट करने में,
जिस विवेक का
परिचय दे रहा है,
उससे विधाता हैरान भी है
और खुश  भी है।

हैरान इसलिए कि, उसने इंसान को
ईश्वर  की सुन्दर कृति कैसे कहा?
और खुश इसलिए कि उसने
पशु -पक्षी, कीट-पतंगों को
विवेक कम दिया।

अन्यथा दुनिया में, इंसान के साथ
प्रकृति पूरी तरह नष्ट हो जाती,
और समय से पहले प्रलय देखकर
विधाता फिर किसे
दुनिया में पहले
सृजन के लिए भेजता।।


Tuesday, March 8, 2016

कीमत

हर तरफ रौशनी   से
घिरे हैं हम,
रौशनीकी कीमत
क्या बतायें हम।

कभी जाके पूछो उनसे,
जो अंधेरों की दुनिया को
रौशनी की दुनिया समझकर
जीते है।

एक-रोशनी यदि
मिल जाये उन्हें
तो अँधेरे की दुनिया का
रास्ता कहाँ से लायें वो।


Monday, March 7, 2016

एहसास

हर माँ को
उसके बच्चों की निगाहें
निहारती रहती है
कहीं शून्य में,
माँ नज़र आ जाये
और एहसास दिला जाये
हाँ बेटा, मैं तेरे करीब हूँ
तू सो जा।

किन्तु माँ कहती है
मुझे अभी नींद नहीं आयेगी,
क्योंकि तेरे दर्द का एहसास
मेरे सीने में जिन्दा है,
उसके बुझने के बाद
मैं सोऊंगी....
चाहे लाख बरस जागना पड़े।

मै जागते हुए उसके बुझने का
इंतजार करूंगी,
तू मेरी फि़क्र मत कर
मैं जागते हुए,
तेरी नींद के एहसास में
गहरी नींद सो लूंगी...!!!

Sunday, March 6, 2016

वजूद

क्या
वजूद के बिना
जीवन
अधूरा है?

क्या
वजूद ही
सफलता का
मापदंड है?

औरों को
गिराकर
कुछ पा लेना
क्या वजूद है?

क्या औरों के
दर्द, खुशी  के लिए
कुछ खो देना,
वजूद नहीं है

नामी की जिन्दगी हमेशा ,
वजूद नहीं हो सकती।
और ना ही।
गुमनामी की जिन्दगी को
बिना वजूद के कहा जा सकता है।

आखिर...
वजूद को जाने कैसे?
‘मै’ में लिपटा मेरा व्यक्तित्व वजूद नहीं है
‘हम’ को दर्शाता मेरा व्यक्तित्व ही वजूद है।
तभी तो कहा जाता है,
वजूद नहीं, तो जीवन नहीं।

Saturday, March 5, 2016

अपेक्षाएं और खीझ

अपेक्षाएं और खीझ
समानांतर चलती है

ना हम अपेक्षाएं रखे
ना हमें खीझ होगी

खीझ अपेक्षा से,
सौ गुना तेज चलती है

सौ प्रतिषत खाीझ से
मुक्ति चाहतें हैं तो

एक प्रतिषत
अपेक्षा को गति ना दे

आदत

सारा जहाँ
बदल गया

तुम बदल गई
मैं बदल गया

नहीं बदली तो
सिर्फ मेरी आदत

पहले तुमसे
जागते हुए मिलने की
आदत थी,

अब
ख़्वाबों में मिलने की 
आदत है। 




Friday, March 4, 2016

दर्द की अनुभूति

दर्द की अनुभूति

मृत्यु शास्वत  सच है, किन्तु
माँ की मृत्यु
दे जाती है अनुभूति,
दर्द की।

खुद के दर्द के लिये
अपनों का दर्द जानना आवश्यक  है। 

अपनों के दर्द की अनुभूति,
गैरो के दर्द की अनुभूति,
बिना संभव नहीं।

इंसान जुंबा का स्वामी है,
इंसान के दर्द की अनुभूति 
बेजुबान के दर्द की अनुभूति-बिन
संभव नहीं। 


Thursday, March 3, 2016

इंसान और यमराज

इंसान और यमराज

हर-तरफ अन्धेरा है
मौत का साया
हर जिन्दा दिलों को
डस रहा है।

‘मौत’ कोई नयी बात तो नहीं,
पहले भी तो लोग मरते थे
मगर आज ‘मौत’ से
इतना डर क्यूँ?

पहले मौत का रखवाला
एक यमराज होता था।

मगर आज
एक इंसान,
दूसरे इंसान के खून का
प्यासा हो गया है।

तभी तो लगता है,
आज का इंसान यमराज हो गया है।


Wednesday, March 2, 2016

खामोशि 

जब भी
मेरी निगाहें
उनकी निगाहों से
टकराती है।

एक
अजीब सी
हलचल
दिल में होती है।

तभी
हवा का झोंका
कानों में
कुछ कह जाता है

निगाहें-निगाहों की बात
समझ गयी हैं,
मगर उनके होंठ
हमारी तरह ही खामोश  है।


Tuesday, March 1, 2016

स्वतंत्रता दिवस-चिंतन

स्वतंत्रता का महत्व
तभी जान पायेंगे
जब भारत को
प्राचीन मूल्यों के
शि खर पर पहुँचायेगें।

सदियों की गुलामी की दास्तां से
मुक्त कराने वाले वीर शहीदों ने
न सिर्फ हमें आजादी दिलाई
बल्कि भारतीय संस्कारों को बचाने की
सीख भी दी।

स्वतंत्रता
आत्म संयम और अनुशासन की
सीख देती है
कहीं हम देश  के वजूद को
स्वयं की स्वतंत्रता समझकर
खो न दे।

Monday, February 29, 2016

माँ का प्रतीक

माँ
सिर्फ नारी का रूप नहीं

यदि भाई के स्नेह में
‘माँ’ का अहसास हो

तब वह भाई‘ भी
‘माँ’ का प्रतीक है।

                                                                                याद

आज
याद
क्या आई
उनकी,
कब्र
से उठ कर
आंखू 
बहाने लगा  
 

Sunday, February 28, 2016

समर्पण और त्याग

माँ
का
उसके 
पति के प्रति
प्यार में
उतना ही
समर्पण है,

जितना 
माँ 
का 
बेटे
के प्रति 
प्यार में 
त्याग। 


Saturday, February 27, 2016

आज का इंसान

आज का इंसान

एक इंसान
अपने जिस्म के हजारों टुकड़े करके
अनुभव करने की कोषिष कर रहा है
दर्द को

खोज रहा है
ईमानदारी को
आखिर कहाँ छिपी है
इंसानियत?

हैरान है
खोजते-खोजते
दर्द 
गया कहाँ?

सोचने को मजबूर,
क्या आज के इंसान के लिए
दर्द की अनुभूति 
आवष्यक नहीं?

क्या अपने आप से गिरकर
जीना ही
आज के इंसान की 
इंसानियत है?

एक बदनसीब इंसान

एक बदनसीब इंसान

एक दर्दनाक चीख....
अमीर के बंगले से टकराई,
मगर पिघला ना सकी
उसके दिल को
कांक्रीट की दीवारों ने,
रोक रखा था उसे।

बुझा हुआ इंसान
छटपटाते हुए,
गेट तक पंहुचा 
और तड़प-तड़प कर कहने लगा...

मेरा बेटा मर गया है,
कफ़न के लिए कुछ पैसे दे दो
दया करो
रहम खाओ,

सुना तुमने?
मेरे बेटे का कसूर सिर्फ इतना था,
उसने तुम्हारी फैक्ट्री की बनी
नकली दवा खााई थी। 
इक तो पैसे नहीं थे,
दवा के लिए
जैसे-तैसे पैसे बटोरे
और उसे दवा खिलाई,

अब मर गया है,
कफ़न के लिए पैसे कहाँ से लाउं?
कुछ तो इंसाफ किया होता
मुझ बदनसीब के साथ।

नकली दवा में
कुछ और भी मिलाया होता,
मरने के बाद उसकी लाश  भी ना बचती
और वह गल गया होता।

कम से कम मुझ बदनसीब बाप को
तेरे दरवाजे पर
अपने बेटे की मौत के बदले
कफ़न ना मांगना पड़ता। 


Friday, February 26, 2016

विश्वास, कब्र

विश्वास

तू नहीं मिली मुझे
जमीं पर?
खोजता फिरूं
अब तुझे
मगर कहाँ?
आसमां के उस पार
या जमीं के अंदर,
लगता नहीं
मिलन होगा
कभी अपना
फिर भी मुझे
विष्वास है
मन में। 

कब्र

जिन्दा
लाषों की
कब्र
का प्रतीक,
कफ्र्यूगस्त
शहर का
हर
चैराहा। 



Thursday, February 25, 2016

माँ की निगाहें

बच्चों की निगाहें
हरदम
शून्य में
निहारती रहती हैं
माँ को।

क्योंकि 
माँ की स्वप्निल निगाहें
हर लेती है 
सब दुखों को
बच्चों के।

उसकी याद में

सूर्यास्त का वक्त
समुद्र का छोर,
गुलषन की महक
प्रकृति,
अपनी सुन्दरता
बिखेर रही थी।

मैं उस वक्त
वहीं लेटा हुआ
प्रकृति की सुन्दरता को
निहार रहा था।

मन प्रफुल्लित
दिल खुष था
तभी पायल की
झंकार ने मुझे
अपनी ओर आकृष्ट किया।

मैं एकाएक चौंका !
दिल की धड़कन बढ़ने लगी,
जिस्म कांप उठा
जुबान रूक गयी।

और मेरी आँखे
उसे एक टक
यँू देखने लगी
जैसे मेरी मनचाही
मुराद पूरी हो गयी हो।

और मैं खुषी के मारे
उसकी बाँहों में बाहंे डालकर
वहीं एक ओर
लेट गया।

तभी मुझे लगा
वो भीग गयी
मैं उसके जिस्म से
पानी पोछने लगा

फिर एक बार
और चैंका
नींद से जागा
और देखा...

मैं जिसके जिस्म से 
पानी पोंछ रहा था,
वो, कोई मन चाही
मुराद नहीं थी।

बल्कि बिस्तर का एक छोर था,
जो उसकी याद में
मेरे आंसुओं से
भीग गया था। 



Wednesday, February 24, 2016

मौत

इंसान एक मौत
से बचने के लिए
हजारों कोशिश'
करता है।
और 
जिन्दा रहते हुए भी
हजारों बार
मरता है।

चैराहा
मैं दोराहे पर नहीं
चैराहें पर खड़ा हूँ । 
दोराहे पर 
एक रास्ता
जिंदगी को
तो दूसरा
मौत को
जाता है। 

चैराहे पर
एक रास्ता
जिंदगी बड़ा
तेरा साथ है

तो दूसरा 
मौत से बड़ी 
तेरी जुदाई का
रास्ता। 
 

Tuesday, February 23, 2016

प्रकृति

विधाता का सुन्दर
सृजन है
प्रकृति।

प्रकृति का
उपहार है,
माँ।

माँ ही
प्रकृति है,
प्रकृति ही 
माँ। 

गुलाब एक फूल

गुलाब
एक फूल
यदि इन्सान की तरह
सोचता,
तो शायद
इतना खिला, सुगन्धित
कभी नहीं होता।

फूल भी,
अपने जिस्म में
इन्सान की तरह,
जहर घोलने लगता,
जो निष्चित ही उसे
जड़ से खोखला कर
गिरा देता। 



Monday, February 22, 2016

माँ-माँ होती है...

माँ-माँ होती है...

एक बच्चे के लिए, उसका पिता
दोस्त या दुश्मन हो सकता है,
दोस्त कभी दुश्मन
दुश्मन  कभी दोस्त हो सकता है।

अपने पराये, पराये अपने हो सकते हैं
वह आज कुछ और है, कल कुछ और हो सकता है,
मैं आज कुछ और हूँ
कल कुछ और हो सकता हूँ।

माँ-
जो कल माँ थी,
आज भी माँ है
कल भी माँ रहेगी।

एक पिता के लिए उसका बेटा
सपूत या कपूत हो सकता है,
एक सपूत या कपूत बेटे के लिए
माँ -माँ होती है।

एक बच्चे के लिए उसकी माँ
अच्छी या बुरी हो सकती है,
अच्छे या बुरे बच्चे के लिए
माँ-माँ होती है।

माँ का कोई अर्थ नहीं
माँ के लिए, कोई शब्द नहीं,
माँ-माँ होती है....
माँ-माँ होती है !!


Sunday, February 21, 2016

अनुक्रम

अनुक्रम

बाई का नज़रिया-7
अनुभूति  -  8

क्र. कविता                  पृष्ठ संख्या                               क्र. कविता              पृष्ठ संख्या
1 माँ-माँ होती है...       11                                             40 जि़न्दगी                         56
2 प्रकृति                 13                                             41 सीख                                 57
3 गुलाब का एक फूल 14                                             42 फासला                         58
4 मौत                      15                                             43 हमसफर                         59
5 चैराहा                 16                                             44 खुशियाँ                         60
6 माँ की निगाहें         17                                             45 हौसला                         61
7 उसकी याद में         18                                             46 गुरू कृपा                         62
8 विष्वास                 20                                             47 इंसानियत खतरे में           64
9 क़ब्र                         21                                             48 माँ, तुम याद आती हो        65
10 एकबदनसीब इंसान 22                                             49 एक बेटी तो होनी चाहिए! 66
11 आज का इंसान 24                                                     50 उपलब्धि                         68
12 समर्पण और त्याग 25                                             51 ज्ञान                                 69
13 माँ का प्रतीक         26                                             52 एक उम्मीद-नया वर्ष         70
14 याद                         27                                             53 अन्न-महिमा                 71
15 स्वतंत्रता दिवस-चिंतन 28                                             54 मध्यस्थता                 72
16 खामोषी                29                                             55 कानून का भय                 73
17 इंसान और यमराज 30                                             56 अतिक्रमण                 74
18 दर्द की अनुभूति         31                                                57       विष्व जनसंख्या दिवस 75
19 अपेक्षाएं और खीझ 32                                             58 साथी                          76
20 आदत                 33                                             59 हकीकत                         77
21 वजूद                         34                                             60 समभाव                         78
22 एहसास                 36                                             61 श्रीगणेष                         79
23 कीमत                 37                                             62 मौन                                  80
24 भ्रूण हत्या                 38                                             63 आत्म-चिंतन                  81
25 जीत                         40                                             64 माँ के समान                  82
26 साथ                        41                                             65 धापी                                 83
27 सजा                         42                                             66 नीड़                                 84
28 काल                   43                                             67 धापी नीड़                         85
29 रफ्तार                44                                             68 जीवन-एक दृष्टिकोण 86
30 माँ का आँचल        45                                             69 अपरिग्रह                         87
31 एक पल               46                                             70 हिरण                         88
32 मेरा प्यारा गाँव-छुईखदान  47                                     71 पैसा                                 89
33 छत्तीसगढ़ का वृन्दावन छुर्दखदान 48                             72 नया वर्ष मंगलमय हो! 90
34 हक                      50                                              73 माँ की याद                 91
35 स्वयं के आकलन का तरीका51                                     74 चलना ही जीवन है         92
36 संबंध           52                                                     75 राजा की खरोंच                 93
37 शेरनी           53                                                     76 रिष्ता                         94
38 इंसानियत  54                                                    77   नज़रिया                         95
39 प्रकृति की अद्भुत निगाहें 55

Saturday, February 20, 2016

अनुभूति

यह मेरा सौभाग्य ही है कि मास्टरजी जिन्हें लेाग, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के नाम से जानते हैं, उनके सानिध्य में मैंने कई वर्ष व्यतीत किये। सन् 1948 में पहली बार मैंने मास्टरजी के दर्षन किये। मास्टरजी हिन्दी विषय के शिक्षक थे, उन्होंने मुझे भी पढ़ाया हैं मेरा यह भी सौभाग्य था कि मास्टरजी सन् 1955 में मेरी शादी की बारात में जिला-बालाघाट के कटंगी गए थे, तथा वहाँ रूके थे। मास्टरजी बहुत दिनों तक तो हमारे गाँव छुईखदान में भी रहे हैं। मास्टरजी की प्रेरणा से मैं हिन्दी साहित्य से जुड़ा रहा और मैंने साहित्यालंकार, शिक्षारत्न, आचार्य एवं हिन्दी विशारद की परीक्षा उत्तीर्ण की। मास्टरजी अत्यंत सरल स्वभाव के थे। सन् 2006 में मुझे बख़्शी सृजन पीठ एवं छत्तीसगढ़ शासन द्वारा बख्शी जी का शिष्य होने का पुरस्कार मिला।
मेेरा छोटा भाई नीलम, जिस कमरे में पढ़ाई करता था उसी कमरे में मास्टरजी दो दिन रूके थे। नीलम को सन् 1975-76 अर्थात उसके स्कूल के दिनों से ही लिखने का शौक था। कई बार उसने मुझे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर दिखाया और मैंने उसे साहित्य के बारे में मास्टरजी की उल्लेख करते हुए बताया था, कि मास्टरजी कितने सरल स्वभाव के उच्च केाटि के व्यक्तित्व के धनी थे। नीलम की कुछ कविताओं को देखने के बाद मैंने उसकी कविताओं में एक संदेश  देखा। माँ के बारे में उसके विचार हमनें उसके जीवन में अनुभव भी किये। 
मैं उसके अत्यंत उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ ।


भंवर लाल सांखला
 


Friday, February 19, 2016

समर्पण

सृजन का अनुपम उपहार
‘‘माँ के श्रीचरणों’’ में
हमसफर की अविस्मरणीय प्रेरणा
एवं बिटिया की सुकोमल भावनाओं में।  

बाई का नज़रिया

हर इंसान अपनी आँखों से दुनिया देखता है। अपनी जुबां से मन के विचार व्यक्त करता है।
न्याय के मंदिर में हमेशा  एक-एक विधिक शब्दों में लम्बी-लम्बी जिरह होती है, हर केाई अपने अनुसार स्वत्व, कब्जा, चोरी, लूट, लापरवाही इत्यादि की व्याख्या करते चले जाता है, और अपनी परिभाषा देता है।
मेरे मन में कई बार यह विचार आता है कि मैं भी अपने मनोभावों को परिभाषित करूं। निगाहें मेरी, नजरिया माँ का, जेहन में रखकर मैंने कई परिभाषाएँ इस पुस्तक के माध्यम से पहली बार आपके समक्ष पेश  करने की साधारण सी कोशिश  की है। मेरी यही आशा  है कि मेरी कविता या यूं कहें मुक्तक को ईष्वर, कुल देवी श्री जेागमाया, श्री रानी भटियाणी माजीसा, आचार्य श्री नानेष, श्री रामेष, माँ-पिताजी, गुरू, भाई, बहन, हमसफर श्रीमती संजू सांखला और बेटी की प्रेरणा से मैंने स्वभाव के अनुसार हिंदुस्तान घूमते हुए प्रकृति के सानिध्य में जाकर व्यक्त किया है।
मैं अपनी बेटी कु.पूर्वी सांखला और कम्प्यूटर मास्टर प्रमोद अचिन्त्य का भी शुक्रगुजार हूँ .....जिन्होंने भी मुझे प्रेरणा दी ......अपने विचार को लोगों के सामने रखने की। मैं, समालोचक डाॅ. प्रवीण गुप्ता एवं यश  पब्लिकेशन का भी शुक्रगुज़ार हूँ ।

नीलम चंद सांखला


Thursday, February 18, 2016

bai ki nazariya




नीलम चंद सांखला



यश  पब्लिकेशंस
दिल्ली




Saturday, February 13, 2016

एक पल

एक पल
उनके साथ
होने को जी चाहता है।

एक पल
सुकुं का
बिताने को जी चाहता है।

हर पल मेरा
उधेड़-बुन में
लगा है।

वह एक-पल,
समर्पण का
लाऊँ कहाँ से?
मेरा प्यारा गाँव-छुईखदान

इस ब्रह्माण्ड में
प्यारी हमारी
धरती माँ

इस धरा के खूबसूरत देश 
हिन्दुस्तान की धड़कन में बसा
छत्तीसगढ़।

छत्तीसगढ़ का शालीन जिला
राजनांदगाँव की आत्मा में बसा
मेरा प्यारा गाँव छुईखदान।

पीली छुई जो घरों को संवारती है
उसी छुई की खदान ने नाम दिया है
मेरे गाँव को छुईखदान।