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Tuesday, April 14, 2015

BHAI




श्रद्धांजली भाई को
                    मिट्टी की तासीर

            ‘‘मृत्यु एक शाश्वत सच है‘‘ किंतु असामयिक मृत्यु मानव मन को हिला कर रख देती है। यदि ऐसे किसी इंसान ने हमारा साथ छोड़ा है जिसे माँ ने असीम प्यार दिया हो उस महान आत्मा ने अपना पूरा जीवन समाज एवं परिवार की सेवा में समर्पण भाव के साथ व्यतीत किये हो और माँ के उस प्यार को माँ की ममता के रूप में परिवार को लौटाया हो तब ऐसे शक्स के हमारे जीवन से अलग हो जाने की कल्पना मात्र से मन कांप उठता है।

           आज मैं ऐसे शक्सियत के धनी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और मैं श्रद्धांजलि अर्पित करते वक्त उस शक्सियत के चिता को जब आग देकर कुछ क्षण एक ओर खड़े होकर चिता की आग बुझने का इंतजार कर रहा था तब मेरी निगाह उस शक्स के चिता की राख को उस मिट्टी पर समाहित देखा जिसे हम धरती माॅं कहते है, तब मुझे मिट्टी की तासिर याद आन पड़ी।

        वह शक्स ऐसा इंसान था जो अपने तन की तकलिफ को नजर अंदाज करते हुए पूरे परिवार के लिये समर्पण भाव से सेवा में रहता था तब मेरे मन में मिट्टी की तासिर फिर से याद आने लगी।

         मिट्टी की तासिर होती है कि वह अपने आप को एक ऐसे आकृति दे जिसे देखकर लोग कह सके कि वह क्या सुंदर कलाकृति है ओैर यह सुन कर वह मिट्टी अपने अस्तित्व का बोध पाकर फूले नहीं समाती है और मन ही मन मुस्कुराने लगती है किन्तु उससे भी अच्छी एक मिट्टी होती है जिसकी निगाहें हमेशा उस मिट्टी की ओर होती है जो लाख कोशिशों के बावजूद अपने आप को आकार नहीं दे पाती तब पहली मिट्टी अपने सब से सुंदर अंश निकाल कर सामने वाली मिट्टी में समाहित हो जाती है और सामने वाली मिट्टी की कलाकृति जब प्रसिद्ध हो जाती है तब पहले वाली मिट्टी अपने अस्तित्व को खोकर सामने वाली मिट्टी के अस्तित्व में असीम सुख और आनंद का अनुभव करती है, ऐसी ही मिट्टी के बने थे मेरे भाई भीखम भैया। मेरे जीवन में माँ के बाद उस भाई के व्यक्तित्व का मुझे साथ मिला जिसने हरदम मुझे माँ का अहसास दिलाया तब मैंने एक बार मन के विचार को व्यक्त भी किया था

‘‘माँ सिर्फ नारी का रूप नहीं
यदि भाई के प्यार में
माँ का एहसास हो
तब वह भाई भी माँ का प्रतीक है‘‘
       
      आज ऐसे इंसान का उसके 61 बरस की उम्र में मेरे जीवन से चले जाना मेरे जीवन में जिस शून्य को छोड़कर गया है उसे मैं शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता।
      सन् 61 में मैं पेैदा हुआ। 61 अंको का जोड़ 7 होता है और प्रकृति 7 अदभूत बातें बताती है, मैं 7वें नंबर का सबसे छोटा हूँ। ये सोच हर पल याद उनकी आती है।
        भीखम भैया से मेरे बहुत ही अनौपचारिक संबंध थे, कुछ दिन पहले की बात है उन्होंने मुझे कहा था डाक्टर इस्सर (सेक्टर-9 भिलाई में पेट के मशहूर डाक्टर) उनसे कह रहे थे आपको अच्छा खानदान मिला, अच्छी पत्नि मिली, पुत्र मिला, पुत्र वधु बेटी जैसी मिली और शायद इसी अस्तित्व में वें आनंद की अनुभूति करते थे।

     अंतिम सांस लेने के पूर्व रात उन्होंने मुझसे बहूत सी बातें की मुकेश की शादी की व्यवस्था और ना जाने क्या-क्या और ये भी कहा था ‘नीलम‘ आज मुझे बहुत अच्छा लग रहा है, अब मुझे भूख भी लगने लगी है, अच्छे से खाना खा रहा हूँ सब कुछ ठीक हो गया है और हर्ष (पुत्र/गुड्डू) ने मेरी इतनी श्रद्धा से सेवा की है जितना की मैंने उसके लिये कभी नहीं किया। उस रात वें न जाने और क्या-क्या कहना चाहते थे, किंतु वक्त ने हमें इजाजत नहीं दी और आधी रात हम सोने के लिये चले गये, दिनांक 14.04.2008 की सुबह मुझे भीखम भैया के दुनिया से दूर जाने की खबर मिली। मुझे क्या मालूम था कि वो काली रात भीखम भैया की आखरी रात होगी, अन्यथा मैं सारी रात उनसे बाते करते रहता और काश कभी सुबह भी नहीं होती।
                                                                                                                                                नीलम
                                                                                                    

                                                                                                      








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