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Thursday, June 26, 2014

Tuesday, June 24, 2014

किलो मीटर

         सिक्कीम यात्रा के दौरान हम लोग सिक्कीम की राजधानी गैगटोक जब पहुंचे तब हमारी इच्छा उस खूबसूरत राज्य के दूरस्थ अंचल को देखने को हुई, फिर हम लोगों ने जीरों र्पाइंट जहां पर भारत देश  की सीमा चीन से मिलती है जाने को हुई। गैगटोक से लाचूंग पहुंचते वक्त उबड़-खाबड़ घाटी वाले रास्ते तय करने में हमे घंटो लगे क्योंकि कुछ वर्ष पहले लाचूंग के आस-पास भयंकर भूकम्प आया था। जिसके कारण रोड की हालत खराब हो गई थी। पूरा रास्ता डर और रोमांच भरा था और करीब 15-20 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से हम लोग अपने स्काॅपियों वाहन से लाचूंग पहुंचे। लाचूंग भी बहुत ठंडा स्थान है और वहां की छटा भी निराली है। हम लोग रात लाचूंग रूके और सुबह युमतांग वेली होते हुए जीरो पाईट के लिये रवाना हुए रास्ते में ख़ूबसूरत नजारा देखते ही बनता था। फूलों  की घाटी ऐसा लगता था, मानो  प्रकृति फूल लेकर घुमक्कड़ो का स्वागत कर रही है। युमतांग वेली में बहती हुई नदियां देखते ही बनती थी फिर हम लोग युम्तांग के ऊपर सरफिर्ली और बर्फिले रास्ते में मंजिल की ओर बढ़ रहे थे, हमारी गाड़ी का किलोमीटर भी मंजिल के निकट आने का संकेत दे रहा था। रास्ते में बर्फ बारी होने लगी जिससे हमारा यात्रा और सुहावना और सुखद् हो गया। हम लोग जीरो पाईंट से लगभग 2 किलोमीटर पहले ही पहुंच पाए क्योंकि सारा रास्ता बर्फ की बड़ी-बड़ी चादर ओढ़ चुकी थी और बार्डर में लगी फोर्स हमें आगे जाने की इजाजत नहीं दे रही थी। 
जब हम लौट रहे थे तब यकिंन ही नहीं हो रहा था कि हम जिन रास्तों से गए थे उन रास्तों पर सफेद रूई के समान बर्फ की चादर कई फिट ढ़क गई थी जिसे संबंधित विभाग द्वारा हटाया जा रहा था और हम लोग धीरे-धीरे वापस लौट रहे थे युम्तांग की ऊंचाई लगभग 11620 फिट थी और हम लोग 15000 फिट से अधिक ऊचाई में पहुंच चुके थे। हमारे एक साथी को जब श्वास लेने में तकलिफ होने लगी तब हमें एहसास हुआ कि आखिर हम कितने ऊंचे पहाड़ तक आ पहुंचे जहां भी निगाहें जाती बर्फिले पहाड़ और पाताल को छू लेने वाली घाटियां दिखाई देे रही थी।
फूलों की घाटी और जहां पर स्नोफाल हुआ वह स्थल हमारे यात्रा का मिल का पत्थर साबित हुआ। गाड़ी इतनी धीमी रफ़्तार से जलती थी कि हर पल हमारा ध्यान किलोमीटर में जाता और हम यह जानने की कोशिश करते, क्या हमनें एक किलोमीटर तय किया है........  

Thursday, June 19, 2014

माँ कानों में कुछ कह जाती है............

माँ कानों में कुछ कह  जाती है

माँ
आज
सारी रात
याद  तेरी आती रही,
नींद निगाहों से
दूर-दूर जाती रही ।

तू भी तो
सारी रात
जागी है, मेरे संग,
कोई नहीं जानता
तेरी तड़प को, मेरे लिये ।

जब मैं
एक पल भी हंसता हूँ
तू सारे जहाँ की हँसी
अपने चेहरे पर लाती है

हर बच्चे का
उसके माँ से
रिश्ता  होता है

तेरा-मेरा
रिश्ता
माँ-बेटे के रिश्ता  से,
हटकर और भी तो है।

तभी तो हरदम तू
कानों में कुछ कह जाती है,
हर पल मुझे
राह दिखाती है.......

नीलम
18.06.2014
रात्रि 4.00 बजे


माँ की पुण्य तिथि पर उनको श्रद्धांजली दिनांक 19.06.2014

 माँ की पुण्य तिथि पर उनको श्रद्धांजली,  दिनांक 19.06.2014







माँ की पुण्य तिथि पर उनको श्रद्धांजली, दिनांक 19.06.2014

माँ की पुण्य तिथि पर उनको श्रद्धांजली दिनांक 19.06.2014

 माई जी के चरणों में 

माई जी से कुछ मांगने जाते है,
मांग पूरी होने पर चढ़ावा चढ़ाते है,
ये हमारा माई जी के प्रति
आस्था नहीं, व्यापार है,
श्रद्धा नहीं स्वार्थ है
समर्पण नहीं,  हमारा डर है।

हम माई जी को
ये भी बताने जा सकते हैं
आज मैं कब्र के करीब एक कदम जरूर पहुँचा हूँ
किन्तु आज मैं कब्र में खुद को नहीं पाया  हूँ
आज मैं इस एक दिन को इंसान समझकर जीया  हूँ
आज मैंने एक घूंट इंसानियत का पीया  हूँ

माई जी
तेरी ही कृपा है
आज मैं
खुद को इंसान  हूँ, यह एहसास कराया है
कल भी मैं ऐसा ही जिंदा रहूंगा
तूने भी तो मुझे एहसास कराया है।

माई जी के चरणों में
आज मैं जिंदा  हूँ
इसलिए अश्रु-सुमन, श्रद्धा संग
चढ़ाने गया  हूँ ,
माईजी के चरणों में
अश्रु-सुमन,  समर्पण संग चढ़ा आया   हूँ
अपनी पीड़ा मिटा आया  हूँ ।

कह आया  हूँ
पीड़ा मुझे रूलाती नहीं ,
पीड़ा मुझे तड़फाती नहीं ,
पीड़ा मुझे नई राह दिखाती है,
पीड़ा मेरी मेरे पास कम है,
औरों की पीड़ा का मैं समन्दर  हूँ 
मेरा दिल अज़ीब है
पीड़ा पाकर फटता नहीं, फैलते जाता है।

हर पीड़ा मुझे
मेरी माँ को
मेरे साथ, हर पल होने का
एहसास करता है,
जीने के लिए, इस जीवन में
किसी वजह की जरूरत नहीं,
मेरी माँ का मेरे पास
रहने का एहसास काफी है,
जीने के लिये।

नीलम
दिनांक-12.06.2014

माँ कुदरत नहीं तो और क्या है ?

माँ कुदरत नहीं तो और क्या है ?


माँ कुदरत नहीं, तो और क्या है ?
माँ का आँचल समन्दर नहीं , तो और क्या है ?
माँ की स्वप्निल निगाहें, चाँद नहीं, तो और क्या है ?
माँ का प्यार समन्दर से गहरा नहीं, तो और क्या है ?
माँ का त्याग हमारा सृजन नहीं, तो और क्या है ?
माँ का हमारे हर दर्द का उसके सीने में स्पन्दन, 
हमारे दिल की धड़कन उसके सीने में नहीं, तो और क्या है ?
माँ का हमारे कानों में कुछ कह जाना और हर पल राह दिखाना,
उसका हर पल हमारे साथ होने का एहसास नहीं तो और क्या है ?
माँ कुदरत का खजाना नहीं, तो और क्या है ?
माँ कुदरत नहीं तो और क्या ?


नीलम 13.06.2014