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Sunday, March 16, 2014

मोड़

      मोड़

आज आँसू झरे हैं , नयन  से
इसलिये नहीं कि ,
आज मैं रोया हूँ।
इसलिये नहीं कि ,
आज अरमान टूटे हैं , मेरे।

'माँ और भाई ' ने
एक ख्वाब संजोये थे ,मेरे  नयन में अपनों का।
आज ख्वाब को टूटते देख
मन मेरा रोया है।

'माँ और भाई' को
टूटे ख्वाब कैसे दिखाऊँगा
ये सोंच आत्मा रोई है।

ख्वाब को सजोने ,
आपना सर्वस्व लुटा आया हूँ ,
इसी ख़ुशी में
नीर नयन से भर आई है।

लोभी ने जीवन को ,
नया   मोड़ दिया।
माँ  ने निगाहों
का नज़रिया
मेरे निगाहों को
आख़िर , दे ही दिया ,
माँ तुझे प्रणाम।

१५। ०३। २०१४

                     


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