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Sunday, March 2, 2014

स्वार्थी

स्वार्थी

रिश्तेदार सामने दोनों हाथों में माला लिये
स्वागत् में खड़े नजर आते है
मुड़कर देखने पर, माले में रखे खंज़र से
वार करते नज़र आते है।

इन आस्तिन के सांपो को
जिस्म का खून कब-तक पिलाएंगे?
क्या बर्बाद होते तक
उन्हें जिस्म से लगाऐंगे।

बेहतर है उस आस्तिन को ही काट दो
एक हाथ से सूरज की नई किरण को सलाम दो
एक कदम नई मंजिल पर रखकर नया पैगाम दो
दूजे कदम पर माँ खूद आयेगी, और दूजा हाथ भी साथ लायेगी।


(बाई का नज़रिया मेरी काव्य संग्रह 28.12.2013 को प्रकाशित हुई घर में मैं बाई को माँ कहता था आज बाई का नज़रिया सार्थक हुआ। आज मैंने अपनों को अपनी निगाहों से नहीं बल्कि बाई की निगाहों से देखा तब उन्हें पहचाना।)

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