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Thursday, February 13, 2014

‘‘बाई का नजरिया’’ एक दृष्टि में

आदरणीय श्री सॉंखला जी,
सर्व प्रथम मकर-संक्रांति की शुभ कामनाएं स्वीकारें।
मेरे मॉंरीशसवासी मित्र श्री राजहीरामन द्वारा आपका परिचय तथा साथ में आपकी काव्य पुस्तक ‘‘बाई का नजरिया’’ प्राप्त हुई। इसके लिए धन्यवाद।
मेरे मित्र का आग्रह रहा कि मैं पुस्तक की समीक्षा कर उसकी स्क्रिप्ट आपको भेजूं। पत्र के साथ वह प्रेषित कर रहा हूं।
इस क्रम में अपना संक्षिप्त परिचय देना उचित समझता हूं। मैं 72 वर्षीय एक सेवा निवृत्त प्राचार्य हूं। इन्दौर में अपने परिवार के साथ रह रहा हूं। मैंने अपने अध्यापन कैरियर की शुरूवाद 1967 में बस्तर जिला के बीजापुर से की। म.प्र. के विभिन्न आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सेवा उपरांत 2003 में धार जिले से सेवा निवृत्त हुआ। थोड़ा बहुत पढ़ने लिखने में समय बीत जाता है।
परिवार में सबको यथा योग्य कहें। आपकी मातृभक्ति से अभिभूत हूं। उत्तर की अपेक्षा में..................
धन्यवाद।
भवदीय
श्रीधर बर्वे
फोन नं.- 0731-2489552
2704 सुदामानगर
सेक्टर ‘ई’ इन्दौर 452009 म.प्र.

‘‘बाई का नजरिया’’ एक दृष्टि में


कवि श्री नीलम चंद की सद्य प्रकाशित काव्य कृति ‘‘ बाई का नजरिया’’ निस्सन्देह मातृ-स्तवन हैं। कृति की अनेक कविताओं का केन्द्र बिन्दु ‘‘माँ’’ है। प्रकृति समाज और विविध परिस्थितियों में सर्वत्र कवि की दृष्टि मातृत्व पर अटकी है। माँ सर्वव्यापी है, कालातीत भी है। पुस्तक की अनेक पंक्तियाँ इस थीम पर दृष्टव्य है - ‘‘ माँ जो कल भी थी, आज भी माँ है। कल भी माँ रहेगी।......................माँ ही प्रकृति है, प्रकृति ही माँ है’’।
माँ और प्रकृति की द्वैतता के भेद को नकारने के साथ-साथ वे ‘‘माँ’’ को अनेक दृष्टि से देखकर अपनी भावांजलि अर्पित करते हैं। माँ के दिवंगत होने के बावजूद सर्वत्र माँ के आर्शीवाद को महसूस करते हैं। ‘‘यकीं नहीं तो देखले नीलम, मेरे सर के ऊपर हर दम। माँ के हाथ का साथ है। ‘‘ श्रद्धा से अभिभूत हो कवि ने अपने निवास का नामकरण माँ के नाम पर ‘‘ धापीनीड़’’ किया है। वे मानते है कि ‘‘नीड़ माने माँ के आंचल तले बसेरा’’। कवि की एक कविता शिवाजी के उस कथन का स्मरण करा देती है, कि काश मेरी माँ भी इतनी सुन्दर हेाती तो मैं भी सुन्दर होता। कवि एक कदम आगे बढ़ कर कहते हैं कि ‘‘जिस नारी की सूरत जन्म देने वाली माँ की याद दिलायें वह नारी भी माँ के समान है।’’ अन्य कविता में वे स्पष्ट करते है मॉं के प्यार को देख कर लगता है जीवन प्यार भरा है।’’ मॉं मेरे जेहन में अब भी मेरे साथ है। ये क्या कम है। मॉं का साथ मेरे लिए’’ कवि की अनुभूति है मातृत्व एक शाश्वत देहातीत भाव धारा है। मॉं जैसा ममत्व और वात्सल्य जिससे भी मिले वहीं मातृतुल्य है- ‘‘यदि भाई के स्नेह में मॉं का अहसास हो तब वह भाई भी मॉं का रूप है। ‘‘ इसी भावभूमि से उपजी थी किशोरीलाल मश्रुबाला की पुस्तक बापू मेरी ‘‘माँ’’ - माश्रुबाला ने राष्ट्रपिता में माँ की छवि पायी थी।
प्रस्तुत कृति दर्शाती है कि कवि की सोच का क्षेत्र व्यापक है। कन्या भ्रूण हत्या ,सामाजिक विषमता, सच्ची स्वतंत्रता जीवन दृष्टि, पर्यावरण, खाद्यान्न की समस्या, कानून जैसे अनेक समाजोपयोगी मसलों पर कवि के दृष्टि कोण से पाठक रूबरू होता है।
हमारे देश में स्वतंत्रता के दुरूपयोग से अनेक समस्याएं उच्श्रृ़।खल राजनेताओं तथा अन्यों ने उत्पन्न कर दी है। स्थिति खतरनाक होती जा रही है। ऐसी स्थिति में कवि की चेतावनी समयानुकूल है। ‘‘ स्वतंत्रता आत्म संयम अनुशासन की सीख देती है। कहीं हम देश के वजूद को स्वयं की स्वतंत्रता समझ कर खो न दें।
नरनारी विषमता की स्थिति हमारे समाज का बहुत बड़ा दोष है। पुत्रों की चाहत में पुत्रियां उपेक्षित और आवांछित सी हो जाती है। इस ओर सटीक पंक्तियाँ सृष्टिकम में बेटियां की महत्ता रेखांकित करती है। ‘‘बेटियॉं का अस्तित्व बचाए रखना ही सबसे बड़ा उपहार है। विधाता फिर किसे दुनिया में पहले सृजन के लिए भेजता?
जीवन को सही ढंग से जीने का मार्गदर्शन ‘‘दर्शन’’ देता है। वैदिक ऋषियों, महावीर, बुद्ध से लेकर वर्तमान तक जीवन दिशा दर्शन मानव जाति को मिलता आया है। वर्तमान जीवन शैली हमें मुखौटे धारण कना सिखाती है। हम जो छुपाते हैं वह हम नहीं है और जो नहीं हैं उसे प्रदर्शित कर जीवन को समस्या ग्रस्त बनाते जा रहे है। कृत्रिमता के खिलाफ कवि का मन विद्रोह कर उठता है। सहज, स्वाभाविक जीवन नहीं हमारा तो जीवन किस काम का खुशी के दो पल यदि नहीं मिलें हमें तो सारी दौलत खुशी शौहरत किस काम की?
एक अंग्रेजी कहावत है कि गलती करना मानवीय स्वभाव है और क्षमा करना दैवीय गुण। त्रुटिकर्ता को जीवन में सुधरने का अवसर मिलना चाहिए। कवि के अंतर का न्यायाधीश इसके लिए निर्णय देता है। किसी की गलती की सजा इतनी न दे ऐ नीलम/कहीं उस बदनसीब को पश्चाताप के लिए वक्त भी न हो।
अन्य कविताएँ भी सहज शब्दों में विचार भावों के स्फटिक रूप हैं। कुछ कविताओं की पंक्तियॉं शब्द मणि के समान है। जो अवसर उपस्थित होने पर बरबस मन में कोंध सकती है।
‘‘ इन्सान ने जितना सम्बन्ध भौतिकता से जोड़ा है।
उससे कहीं ज्यादा अपनों से तोड़ा है।

जीवन का एक कदम दूसरों के लिए बढ़ाओं।
मंजित पर पहुँचना सार्थक हो जाएगा।

‘‘रंक की चीख के आगे, राजा की खरोंच दिखती हैं।
‘‘मैं’’ में लिपट मेरा व्यक्तित्व वजूद नहीं है।
‘‘हम’’ को दर्शाता मेरा व्यक्तित्व ही वजूद है।

अकृत्रिम और सरल शब्दों में प्रस्तुत कविताएँ चेतना को चौंकाने में समर्थ है। छन्द और तुकों से मुक्त कविताएँ सीधे मन को स्पर्श करती हुई कवि की अनुभूतियों को संप्रेषित करने में सफल है।
पुस्तक का मुद्रण और गेटअप आकर्षक है। आवरण पृष्ठ का चित्र पुस्तक के शीर्शक के अनुकूल है। केवल कुछ प्रूफ की त्रुटियॉं खलती है। यथा आसंमा के स्थान पर आंसमा (पृष्ठ 44) ब्रम्हाण्ड के स्थान पर बह्याण्ड (पृष्ठ 47) एवं ऊपर की अपेक्षा उपर जैसी त्रुटियाँ चुभती हैं। आशा है भावी संस्करण ऐसी त्रुटियों से मुक्त रहेगा।

श्रीधर बर्वे