have faith in me and in my blog ....and.... i m sure u'll then start appreciating nature and small small things around yourself!!! so, FEEL FREE TO SUBSCRIBE & ENJOY!!!

Monday, December 1, 2014

माई के चरण

     

माई के बगियाँ में
माई का चरण मैंने देखा है
डंकनी - शंखनी का अदभूत संगम भी 
मैने देखा है

Thursday, November 6, 2014

माई जी के चरणों में



माई जी के चरणों में
दंतेवाड़ा,  बस्तर,  छत्तीसगढ़, मे माँ दंतेश्वरी  का मन्दिर 

दुनिया के, 51 इन्क्यावन शक्तिपीठ में
ये शक्तिपीठ निराली है 
दन्त गिरे यहाँ माँ के
मगर अदभुत-नयन यहाँ निराले है

Saturday, November 1, 2014

माई जी के चरणों में

माई जी के चरणों में

दन्तेवाड़ा’ को  धाम बना ,
बस्तरको जग में नाम दिया
सिर्फ जंगल की देवी नहीं,

ये जग की अदभुत  देवी है।

Friday, October 31, 2014

माई जी के चरणों में

माई जी के चरणों में 

ये  डंकनी -शंखनी  नदियाँ 
माईजी  के  पांव  पखारे  हैं ,
राजा  के संग  पधारी  है 
ये  दन्तेश्वरी  माई  हमारी  है। 


Monday, September 1, 2014

श्रीमति बिदामी बाई श्रद्धांजली, पुण्य तिथि



पुण्य तिथि 
माँ  १०० बरस 
श्रीमति बिदामी बाई 

Sunday, August 24, 2014

धापी



धापी /माँ /बाई /आई /मदर /मम्मा /माई /मम्मी /दाई 

Sunday, August 3, 2014

FRIENDSHIP DAY

FRIENDSHIP DAY
DOST


DOSTI

DOST

Monday, July 28, 2014

सावन सोमवार



मुझे बारह ज्योर्तिलिंगों में से दो श्री महाकाल उज्जैन, मध्य प्रदेश  के चार बार और  ओंकारेश्वर  मध्य प्रदेश  के दो बार जिसमें से एक सावन सोमवार में दर्शन  के अवसर मिले..भोले शंकर जी के 

Saturday, July 12, 2014

Thursday, June 26, 2014

Tuesday, June 24, 2014

किलो मीटर

         सिक्कीम यात्रा के दौरान हम लोग सिक्कीम की राजधानी गैगटोक जब पहुंचे तब हमारी इच्छा उस खूबसूरत राज्य के दूरस्थ अंचल को देखने को हुई, फिर हम लोगों ने जीरों र्पाइंट जहां पर भारत देश  की सीमा चीन से मिलती है जाने को हुई। गैगटोक से लाचूंग पहुंचते वक्त उबड़-खाबड़ घाटी वाले रास्ते तय करने में हमे घंटो लगे क्योंकि कुछ वर्ष पहले लाचूंग के आस-पास भयंकर भूकम्प आया था। जिसके कारण रोड की हालत खराब हो गई थी। पूरा रास्ता डर और रोमांच भरा था और करीब 15-20 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से हम लोग अपने स्काॅपियों वाहन से लाचूंग पहुंचे। लाचूंग भी बहुत ठंडा स्थान है और वहां की छटा भी निराली है। हम लोग रात लाचूंग रूके और सुबह युमतांग वेली होते हुए जीरो पाईट के लिये रवाना हुए रास्ते में ख़ूबसूरत नजारा देखते ही बनता था। फूलों  की घाटी ऐसा लगता था, मानो  प्रकृति फूल लेकर घुमक्कड़ो का स्वागत कर रही है। युमतांग वेली में बहती हुई नदियां देखते ही बनती थी फिर हम लोग युम्तांग के ऊपर सरफिर्ली और बर्फिले रास्ते में मंजिल की ओर बढ़ रहे थे, हमारी गाड़ी का किलोमीटर भी मंजिल के निकट आने का संकेत दे रहा था। रास्ते में बर्फ बारी होने लगी जिससे हमारा यात्रा और सुहावना और सुखद् हो गया। हम लोग जीरो पाईंट से लगभग 2 किलोमीटर पहले ही पहुंच पाए क्योंकि सारा रास्ता बर्फ की बड़ी-बड़ी चादर ओढ़ चुकी थी और बार्डर में लगी फोर्स हमें आगे जाने की इजाजत नहीं दे रही थी। 
जब हम लौट रहे थे तब यकिंन ही नहीं हो रहा था कि हम जिन रास्तों से गए थे उन रास्तों पर सफेद रूई के समान बर्फ की चादर कई फिट ढ़क गई थी जिसे संबंधित विभाग द्वारा हटाया जा रहा था और हम लोग धीरे-धीरे वापस लौट रहे थे युम्तांग की ऊंचाई लगभग 11620 फिट थी और हम लोग 15000 फिट से अधिक ऊचाई में पहुंच चुके थे। हमारे एक साथी को जब श्वास लेने में तकलिफ होने लगी तब हमें एहसास हुआ कि आखिर हम कितने ऊंचे पहाड़ तक आ पहुंचे जहां भी निगाहें जाती बर्फिले पहाड़ और पाताल को छू लेने वाली घाटियां दिखाई देे रही थी।
फूलों की घाटी और जहां पर स्नोफाल हुआ वह स्थल हमारे यात्रा का मिल का पत्थर साबित हुआ। गाड़ी इतनी धीमी रफ़्तार से जलती थी कि हर पल हमारा ध्यान किलोमीटर में जाता और हम यह जानने की कोशिश करते, क्या हमनें एक किलोमीटर तय किया है........  

Thursday, June 19, 2014

माँ कानों में कुछ कह जाती है............

माँ कानों में कुछ कह  जाती है

माँ
आज
सारी रात
याद  तेरी आती रही,
नींद निगाहों से
दूर-दूर जाती रही ।

तू भी तो
सारी रात
जागी है, मेरे संग,
कोई नहीं जानता
तेरी तड़प को, मेरे लिये ।

जब मैं
एक पल भी हंसता हूँ
तू सारे जहाँ की हँसी
अपने चेहरे पर लाती है

हर बच्चे का
उसके माँ से
रिश्ता  होता है

तेरा-मेरा
रिश्ता
माँ-बेटे के रिश्ता  से,
हटकर और भी तो है।

तभी तो हरदम तू
कानों में कुछ कह जाती है,
हर पल मुझे
राह दिखाती है.......

नीलम
18.06.2014
रात्रि 4.00 बजे


माँ की पुण्य तिथि पर उनको श्रद्धांजली दिनांक 19.06.2014

 माँ की पुण्य तिथि पर उनको श्रद्धांजली,  दिनांक 19.06.2014







माँ की पुण्य तिथि पर उनको श्रद्धांजली, दिनांक 19.06.2014

माँ की पुण्य तिथि पर उनको श्रद्धांजली दिनांक 19.06.2014

 माई जी के चरणों में 

माई जी से कुछ मांगने जाते है,
मांग पूरी होने पर चढ़ावा चढ़ाते है,
ये हमारा माई जी के प्रति
आस्था नहीं, व्यापार है,
श्रद्धा नहीं स्वार्थ है
समर्पण नहीं,  हमारा डर है।

हम माई जी को
ये भी बताने जा सकते हैं
आज मैं कब्र के करीब एक कदम जरूर पहुँचा हूँ
किन्तु आज मैं कब्र में खुद को नहीं पाया  हूँ
आज मैं इस एक दिन को इंसान समझकर जीया  हूँ
आज मैंने एक घूंट इंसानियत का पीया  हूँ

माई जी
तेरी ही कृपा है
आज मैं
खुद को इंसान  हूँ, यह एहसास कराया है
कल भी मैं ऐसा ही जिंदा रहूंगा
तूने भी तो मुझे एहसास कराया है।

माई जी के चरणों में
आज मैं जिंदा  हूँ
इसलिए अश्रु-सुमन, श्रद्धा संग
चढ़ाने गया  हूँ ,
माईजी के चरणों में
अश्रु-सुमन,  समर्पण संग चढ़ा आया   हूँ
अपनी पीड़ा मिटा आया  हूँ ।

कह आया  हूँ
पीड़ा मुझे रूलाती नहीं ,
पीड़ा मुझे तड़फाती नहीं ,
पीड़ा मुझे नई राह दिखाती है,
पीड़ा मेरी मेरे पास कम है,
औरों की पीड़ा का मैं समन्दर  हूँ 
मेरा दिल अज़ीब है
पीड़ा पाकर फटता नहीं, फैलते जाता है।

हर पीड़ा मुझे
मेरी माँ को
मेरे साथ, हर पल होने का
एहसास करता है,
जीने के लिए, इस जीवन में
किसी वजह की जरूरत नहीं,
मेरी माँ का मेरे पास
रहने का एहसास काफी है,
जीने के लिये।

नीलम
दिनांक-12.06.2014

माँ कुदरत नहीं तो और क्या है ?

माँ कुदरत नहीं तो और क्या है ?


माँ कुदरत नहीं, तो और क्या है ?
माँ का आँचल समन्दर नहीं , तो और क्या है ?
माँ की स्वप्निल निगाहें, चाँद नहीं, तो और क्या है ?
माँ का प्यार समन्दर से गहरा नहीं, तो और क्या है ?
माँ का त्याग हमारा सृजन नहीं, तो और क्या है ?
माँ का हमारे हर दर्द का उसके सीने में स्पन्दन, 
हमारे दिल की धड़कन उसके सीने में नहीं, तो और क्या है ?
माँ का हमारे कानों में कुछ कह जाना और हर पल राह दिखाना,
उसका हर पल हमारे साथ होने का एहसास नहीं तो और क्या है ?
माँ कुदरत का खजाना नहीं, तो और क्या है ?
माँ कुदरत नहीं तो और क्या ?


नीलम 13.06.2014

Thursday, May 15, 2014

दोस्त

दोस्त
‘‘दोस्त’’ से
अच्छा दोस्त,
अच्छा होता है ।
बहुत अच्छा दोस्त
कहाँ होता है ?
मैंने
बहुत अच्छा दोस्त
को जाना है ।
उसने भी
मुझे
पहचाना है ।
दोस्ती का रिश्ता
सब रिश्तों से
परे होता है ।
आओ अब
सब रिश्तों की
रश्म निभायें
‘‘दोस्त’’ होने का
एहसास करायें।

                                                                                                       नीलम
                                                                                                  13 मई 2014

                                                                                                      7.9.12

Monday, April 14, 2014

श्रद्धांजली भाई को




श्रद्धांजली भाई को
                    मिट्टी की तासीर

            ‘‘मृत्यु एक शाश्वत सच है‘‘ किंतु असामयिक मृत्यु मानव मन को हिला कर रख देती है। यदि ऐसे किसी इंसान ने हमारा साथ छोड़ा है जिसे माँ ने असीम प्यार दिया हो उस महान आत्मा ने अपना पूरा जीवन समाज एवं परिवार की सेवा में समर्पण भाव के साथ व्यतीत किये हो और माँ के उस प्यार को माँ की ममता के रूप में परिवार को लौटाया हो तब ऐसे शक्स के हमारे जीवन से अलग हो जाने की कल्पना मात्र से मन कांप उठता है।

           आज मैं ऐसे शक्सियत के धनी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और मैं श्रद्धांजलि अर्पित करते वक्त उस शक्सियत के चिता को जब आग देकर कुछ क्षण एक ओर खड़े होकर चिता की आग बुझने का इंतजार कर रहा था तब मेरी निगाह उस शक्स के चिता की राख को उस मिट्टी पर समाहित देखा जिसे हम धरती माॅं कहते है, तब मुझे मिट्टी की तासिर याद आन पड़ी।

        वह शक्स ऐसा इंसान था जो अपने तन की तकलिफ को नजर अंदाज करते हुए पूरे परिवार के लिये समर्पण भाव से सेवा में रहता था तब मेरे मन में मिट्टी की तासिर फिर से याद आने लगी।

         मिट्टी की तासिर होती है कि वह अपने आप को एक ऐसे आकृति दे जिसे देखकर लोग कह सके कि वह क्या सुंदर कलाकृति है ओैर यह सुन कर वह मिट्टी अपने अस्तित्व का बोध पाकर फूले नहीं समाती है और मन ही मन मुस्कुराने लगती है किन्तु उससे भी अच्छी एक मिट्टी होती है जिसकी निगाहें हमेशा उस मिट्टी की ओर होती है जो लाख कोशिशों के बावजूद अपने आप को आकार नहीं दे पाती तब पहली मिट्टी अपने सब से सुंदर अंश निकाल कर सामने वाली मिट्टी में समाहित हो जाती है और सामने वाली मिट्टी की कलाकृति जब प्रसिद्ध हो जाती है तब पहले वाली मिट्टी अपने अस्तित्व को खोकर सामने वाली मिट्टी के अस्तित्व में असीम सुख और आनंद का अनुभव करती है, ऐसी ही मिट्टी के बने थे मेरे भाई भीखम भैया। मेरे जीवन में माँ के बाद उस भाई के व्यक्तित्व का मुझे साथ मिला जिसने हरदम मुझे माँ का अहसास दिलाया तब मैंने एक बार मन के विचार को व्यक्त भी किया था

‘‘माँ सिर्फ नारी का रूप नहीं
यदि भाई के प्यार में
माॅं का एहसास हो
तब वह भाई भी माॅं का प्रतीक है‘‘
       
      आज ऐसे इंसान का उसके 61 बरस की उम्र में मेरे जीवन से चले जाना मेरे जीवन में जिस शून्य को छोड़कर गया है उसे मैं शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता।
      सन् 61 में मैं पेैदा हुआ। 61 अंको का जोड़ 7 होता है और प्रकृति 7 अदभूत बातें बताती है, मैं 7वें नंबर का सबसे छोटा हूँ। ये सोच हर पल याद उनकी आती है।
        भीखम भैया से मेरे बहुत ही अनौपचारिक संबंध थे, कुछ दिन पहले की बात है उन्होंने मुझे कहा था डाक्टर इस्सर (सेक्टर-9 भिलाई में पेट के मशहूर डाक्टर) उनसे कह रहे थे आपको अच्छा खानदान मिला, अच्छी पत्नि मिली, पुत्र मिला, पुत्र वधु बेटी जैसी मिली और शायद इसी अस्तित्व में वें आनंद की अनुभूति करते थे।

     अंतिम सांस लेने के पूर्व रात उन्होंने मुझसे बहूत सी बातें की मुकेश की शादी की व्यवस्था और ना जाने क्या-क्या और ये भी कहा था ‘नीलम‘ आज मुझे बहुत अच्छा लग रहा है, अब मुझे भूख भी लगने लगी है, अच्छे से खाना खा रहा हूँ सब कुछ ठीक हो गया है और हर्ष (पुत्र/गुड्डू) ने मेरी इतनी श्रद्धा से सेवा की है जितना की मैंने उसके लिये कभी नहीं किया। उस रात वें न जाने और क्या-क्या कहना चाहते थे, किंतु वक्त ने हमें इजाजत नहीं दी और आधी रात हम सोने के लिये चले गये, दिनांक 14.04.2008 की सुबह मुझे भीखम भैया के दुनिया से दूर जाने की खबर मिली। मुझे क्या मालूम था कि वो काली रात भीखम भैया की आखरी रात होगी, अन्यथा मैं सारी रात उनसे बाते करते रहता और काश कभी सुबह भी नहीं होती।
                                                                                                           नीलम
                                                                                                      16.04.2008
                                                                                          16 अप्रैल 2008 में मेरे द्वारा    
                                                                                            व्यक्त उद्गार शोक सभा में








Monday, March 24, 2014

-ःः समीक्षा:ः-

                                          -ःः समीक्षा:ः-
काव्य संग्रह - बाई का नज़रिया
रचनाकार - श्रद्धेय श्री नीलम चंद सांखला

        शैक्षणिक एवं आध्यात्मिक अभिरूचियों, न्यायिक सेवा के गुरूतर दायित्व के कुशल निर्वहन के साथ-साथ काव्य को अपनी मनःपूजा मानने वाले कवि हृदय के धनी श्रद्वेय श्री नीलम चंद सांखला द्वारा रचित काव्य संग्रह ‘‘बाई का नज़रिया‘‘ उनकी विविध रचनाओ से परिपूर्ण है। इन रचनाओं में विविधता के दर्शन होते है। अनुभूति होती है एक ऐसे संवेदनशील कवि की जो इंसानियत के प्रति सजग है, दीन की पीड़ा को महसूस करता है, समाज, संस्कृति एवं सभ्यता के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे को भाॅपने की क्षमता रखता है इसलिये वह अपने अन्तर्मन की पीड़ा एवं भावना को कलम के सहारे काव्य का रूप देने का सार्थक प्रयास बड़ी सहजता के साथ करता है, जिसकी परिणति ‘‘बाई का नज़रिया‘‘ के रूप में सामने आती है।
        प्रकृति के अनमोल उपहार के रूप में माॅ की ममता को समर्पित है ‘‘बाई का नज़रिया‘‘। माॅ वास्तव में माॅ ही होती है उसका कोई विकल्प ही नहीं है। प्रकृति के प्रति सहज आकर्षण इनकी रचनाओ में समाहित है। कविता-‘प्रकृति‘ ‘गुलाब के फूल‘ प्रकृति की अदभूत निगाहें इसका ज्वलंत उदाहरण है। ‘‘एक बदनसीब इंसान‘‘ में नकली दवा माफिया के प्रति करारा व्यंग्य है, यह रचना सीधे हृदय को स्पर्श करती है। आज का इंसान में इंसानियत के प्रति चिंतन निकल पड़ा है। राष्ट्रप्रेम को समाहित करती रचना ‘‘स्वतंत्रता दिवस-चिंतन‘‘ स्वतंत्रता के महत्व पर ध्यान आकर्षित कराती है। कन्या संतति के संरक्षण को महत्व देती रचना ‘‘भू्रण हत्या‘‘ करारा तमाचा है उनके लिये जो कन्या भू्रण को गर्भ में ही खत्म करवा देते है।
        श्री सांखला जी जन्मभूमि की महत्ता को अच्छी तरह से समझते है। अपनी जन्मभूमि ‘छूईखदान‘ को समर्पित उनकी रचना मर्मस्पर्शी है। पर्यावरण संतुलन के प्रति उनका कवि हृदय मचल उठा है- ‘शेरनी‘ नामक रचना में। छत्तसीगढ़ के वनोपज के प्रति उनका प्रेम एवं महत्व ‘‘प्रकृति की अदभूत निगाहें‘‘ नामक रचना में दृष्टव्य है तेंदू के गुण एवं महत्व पर बरबस ध्यान आकृष्ट होता है। ‘‘हौसला‘‘ शीर्षक में संदेश है सदैव आशा एवं विश्वास के साथ कदम बढ़ाने का। एक पिता का बेटी के प्रति असीम स्नेह का प्रतीक है- ‘‘एक बेटी तो होनी चाहिये‘‘। रचना ‘‘माॅ का प्रतीक‘‘ आज के संदर्भ में जीवन संदेश देती है कि सच्चा भाई माॅ का स्वरूप ही होता है। वह कलयुग में राम-भरत का प्रेम दर्शन उपस्थित करता है।
        प्रसाद एवं माधुर्य गुणों का समन्वय दृष्टव्य है। लक्षणा एवं अभिधा शब्द-शक्ति तथा व्यंग्यात्मक शैली काव्य का आकर्षण है। काव्य संग्रह ‘‘बाई का नज़रिया‘‘ में अन्त क्षणिकायें अपने शीर्षक को सार्थक करती प्रतीत होती है। शब्द-विन्यासों का सफल समन्वय रचनाओ में है।
        मैं कतई एक स्थापित समीक्षक नहीं हूं फिर भी मैंने एक छोटा सा प्रयास किया है, समीक्षात्मक दृष्टि डालने का।
        श्री सांखला जी के प्रति भक्तिवर्धक भविष्य की अंनत मंगलकामनाओं के साथ कोटिशः साधुवाद ज्ञापित करता हूं।

दिनांकः- 28.12.2013   
     (डाॅ. प्रवीण गुप्ता)
                अ. व्याख्याता
        शास. नेमीचंद जैन महाविद्यालय
                     दल्लीराजहरा   
                    जिला- बालोद
               निवासी-आमापारा बालोद
           मो.9406207171, 8889136057

Sunday, March 16, 2014

मोड़

      मोड़

आज आँसू झरे हैं , नयन  से
इसलिये नहीं कि ,
आज मैं रोया हूँ।
इसलिये नहीं कि ,
आज अरमान टूटे हैं , मेरे।

'माँ और भाई ' ने
एक ख्वाब संजोये थे ,मेरे  नयन में अपनों का।
आज ख्वाब को टूटते देख
मन मेरा रोया है।

'माँ और भाई' को
टूटे ख्वाब कैसे दिखाऊँगा
ये सोंच आत्मा रोई है।

ख्वाब को सजोने ,
आपना सर्वस्व लुटा आया हूँ ,
इसी ख़ुशी में
नीर नयन से भर आई है।

लोभी ने जीवन को ,
नया   मोड़ दिया।
माँ  ने निगाहों
का नज़रिया
मेरे निगाहों को
आख़िर , दे ही दिया ,
माँ तुझे प्रणाम।

१५। ०३। २०१४

                     


Sunday, March 2, 2014

स्वार्थी

स्वार्थी

रिश्तेदार सामने दोनों हाथों में माला लिये
स्वागत् में खड़े नजर आते है
मुड़कर देखने पर, माले में रखे खंज़र से
वार करते नज़र आते है।

इन आस्तिन के सांपो को
जिस्म का खून कब-तक पिलाएंगे?
क्या बर्बाद होते तक
उन्हें जिस्म से लगाऐंगे।

बेहतर है उस आस्तिन को ही काट दो
एक हाथ से सूरज की नई किरण को सलाम दो
एक कदम नई मंजिल पर रखकर नया पैगाम दो
दूजे कदम पर माँ खूद आयेगी, और दूजा हाथ भी साथ लायेगी।


(बाई का नज़रिया मेरी काव्य संग्रह 28.12.2013 को प्रकाशित हुई घर में मैं बाई को माँ कहता था आज बाई का नज़रिया सार्थक हुआ। आज मैंने अपनों को अपनी निगाहों से नहीं बल्कि बाई की निगाहों से देखा तब उन्हें पहचाना।)

Thursday, February 13, 2014

‘‘बाई का नजरिया’’ एक दृष्टि में

आदरणीय श्री सॉंखला जी,
सर्व प्रथम मकर-संक्रांति की शुभ कामनाएं स्वीकारें।
मेरे मॉंरीशसवासी मित्र श्री राजहीरामन द्वारा आपका परिचय तथा साथ में आपकी काव्य पुस्तक ‘‘बाई का नजरिया’’ प्राप्त हुई। इसके लिए धन्यवाद।
मेरे मित्र का आग्रह रहा कि मैं पुस्तक की समीक्षा कर उसकी स्क्रिप्ट आपको भेजूं। पत्र के साथ वह प्रेषित कर रहा हूं।
इस क्रम में अपना संक्षिप्त परिचय देना उचित समझता हूं। मैं 72 वर्षीय एक सेवा निवृत्त प्राचार्य हूं। इन्दौर में अपने परिवार के साथ रह रहा हूं। मैंने अपने अध्यापन कैरियर की शुरूवाद 1967 में बस्तर जिला के बीजापुर से की। म.प्र. के विभिन्न आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सेवा उपरांत 2003 में धार जिले से सेवा निवृत्त हुआ। थोड़ा बहुत पढ़ने लिखने में समय बीत जाता है।
परिवार में सबको यथा योग्य कहें। आपकी मातृभक्ति से अभिभूत हूं। उत्तर की अपेक्षा में..................
धन्यवाद।
भवदीय
श्रीधर बर्वे
फोन नं.- 0731-2489552
2704 सुदामानगर
सेक्टर ‘ई’ इन्दौर 452009 म.प्र.

‘‘बाई का नजरिया’’ एक दृष्टि में


कवि श्री नीलम चंद की सद्य प्रकाशित काव्य कृति ‘‘ बाई का नजरिया’’ निस्सन्देह मातृ-स्तवन हैं। कृति की अनेक कविताओं का केन्द्र बिन्दु ‘‘माँ’’ है। प्रकृति समाज और विविध परिस्थितियों में सर्वत्र कवि की दृष्टि मातृत्व पर अटकी है। माँ सर्वव्यापी है, कालातीत भी है। पुस्तक की अनेक पंक्तियाँ इस थीम पर दृष्टव्य है - ‘‘ माँ जो कल भी थी, आज भी माँ है। कल भी माँ रहेगी।......................माँ ही प्रकृति है, प्रकृति ही माँ है’’।
माँ और प्रकृति की द्वैतता के भेद को नकारने के साथ-साथ वे ‘‘माँ’’ को अनेक दृष्टि से देखकर अपनी भावांजलि अर्पित करते हैं। माँ के दिवंगत होने के बावजूद सर्वत्र माँ के आर्शीवाद को महसूस करते हैं। ‘‘यकीं नहीं तो देखले नीलम, मेरे सर के ऊपर हर दम। माँ के हाथ का साथ है। ‘‘ श्रद्धा से अभिभूत हो कवि ने अपने निवास का नामकरण माँ के नाम पर ‘‘ धापीनीड़’’ किया है। वे मानते है कि ‘‘नीड़ माने माँ के आंचल तले बसेरा’’। कवि की एक कविता शिवाजी के उस कथन का स्मरण करा देती है, कि काश मेरी माँ भी इतनी सुन्दर हेाती तो मैं भी सुन्दर होता। कवि एक कदम आगे बढ़ कर कहते हैं कि ‘‘जिस नारी की सूरत जन्म देने वाली माँ की याद दिलायें वह नारी भी माँ के समान है।’’ अन्य कविता में वे स्पष्ट करते है मॉं के प्यार को देख कर लगता है जीवन प्यार भरा है।’’ मॉं मेरे जेहन में अब भी मेरे साथ है। ये क्या कम है। मॉं का साथ मेरे लिए’’ कवि की अनुभूति है मातृत्व एक शाश्वत देहातीत भाव धारा है। मॉं जैसा ममत्व और वात्सल्य जिससे भी मिले वहीं मातृतुल्य है- ‘‘यदि भाई के स्नेह में मॉं का अहसास हो तब वह भाई भी मॉं का रूप है। ‘‘ इसी भावभूमि से उपजी थी किशोरीलाल मश्रुबाला की पुस्तक बापू मेरी ‘‘माँ’’ - माश्रुबाला ने राष्ट्रपिता में माँ की छवि पायी थी।
प्रस्तुत कृति दर्शाती है कि कवि की सोच का क्षेत्र व्यापक है। कन्या भ्रूण हत्या ,सामाजिक विषमता, सच्ची स्वतंत्रता जीवन दृष्टि, पर्यावरण, खाद्यान्न की समस्या, कानून जैसे अनेक समाजोपयोगी मसलों पर कवि के दृष्टि कोण से पाठक रूबरू होता है।
हमारे देश में स्वतंत्रता के दुरूपयोग से अनेक समस्याएं उच्श्रृ़।खल राजनेताओं तथा अन्यों ने उत्पन्न कर दी है। स्थिति खतरनाक होती जा रही है। ऐसी स्थिति में कवि की चेतावनी समयानुकूल है। ‘‘ स्वतंत्रता आत्म संयम अनुशासन की सीख देती है। कहीं हम देश के वजूद को स्वयं की स्वतंत्रता समझ कर खो न दें।
नरनारी विषमता की स्थिति हमारे समाज का बहुत बड़ा दोष है। पुत्रों की चाहत में पुत्रियां उपेक्षित और आवांछित सी हो जाती है। इस ओर सटीक पंक्तियाँ सृष्टिकम में बेटियां की महत्ता रेखांकित करती है। ‘‘बेटियॉं का अस्तित्व बचाए रखना ही सबसे बड़ा उपहार है। विधाता फिर किसे दुनिया में पहले सृजन के लिए भेजता?
जीवन को सही ढंग से जीने का मार्गदर्शन ‘‘दर्शन’’ देता है। वैदिक ऋषियों, महावीर, बुद्ध से लेकर वर्तमान तक जीवन दिशा दर्शन मानव जाति को मिलता आया है। वर्तमान जीवन शैली हमें मुखौटे धारण कना सिखाती है। हम जो छुपाते हैं वह हम नहीं है और जो नहीं हैं उसे प्रदर्शित कर जीवन को समस्या ग्रस्त बनाते जा रहे है। कृत्रिमता के खिलाफ कवि का मन विद्रोह कर उठता है। सहज, स्वाभाविक जीवन नहीं हमारा तो जीवन किस काम का खुशी के दो पल यदि नहीं मिलें हमें तो सारी दौलत खुशी शौहरत किस काम की?
एक अंग्रेजी कहावत है कि गलती करना मानवीय स्वभाव है और क्षमा करना दैवीय गुण। त्रुटिकर्ता को जीवन में सुधरने का अवसर मिलना चाहिए। कवि के अंतर का न्यायाधीश इसके लिए निर्णय देता है। किसी की गलती की सजा इतनी न दे ऐ नीलम/कहीं उस बदनसीब को पश्चाताप के लिए वक्त भी न हो।
अन्य कविताएँ भी सहज शब्दों में विचार भावों के स्फटिक रूप हैं। कुछ कविताओं की पंक्तियॉं शब्द मणि के समान है। जो अवसर उपस्थित होने पर बरबस मन में कोंध सकती है।
‘‘ इन्सान ने जितना सम्बन्ध भौतिकता से जोड़ा है।
उससे कहीं ज्यादा अपनों से तोड़ा है।

जीवन का एक कदम दूसरों के लिए बढ़ाओं।
मंजित पर पहुँचना सार्थक हो जाएगा।

‘‘रंक की चीख के आगे, राजा की खरोंच दिखती हैं।
‘‘मैं’’ में लिपट मेरा व्यक्तित्व वजूद नहीं है।
‘‘हम’’ को दर्शाता मेरा व्यक्तित्व ही वजूद है।

अकृत्रिम और सरल शब्दों में प्रस्तुत कविताएँ चेतना को चौंकाने में समर्थ है। छन्द और तुकों से मुक्त कविताएँ सीधे मन को स्पर्श करती हुई कवि की अनुभूतियों को संप्रेषित करने में सफल है।
पुस्तक का मुद्रण और गेटअप आकर्षक है। आवरण पृष्ठ का चित्र पुस्तक के शीर्शक के अनुकूल है। केवल कुछ प्रूफ की त्रुटियॉं खलती है। यथा आसंमा के स्थान पर आंसमा (पृष्ठ 44) ब्रम्हाण्ड के स्थान पर बह्याण्ड (पृष्ठ 47) एवं ऊपर की अपेक्षा उपर जैसी त्रुटियाँ चुभती हैं। आशा है भावी संस्करण ऐसी त्रुटियों से मुक्त रहेगा।

श्रीधर बर्वे

Thursday, January 30, 2014

Wednesday, January 22, 2014

काव्य संग्रह बाई का नजरिया का विमोचन

कविता के केन्‍द्र में इन्सान होना चाहिए
हिन्दी मारीशस की अस्मिता है: हीरामन


रायपुर 28 दिसम्बर, हिन्दी मारिशस की अस्मिता है। मारीशस ने महिला आरक्षण लागू कर मातृशक्ति का सम्मान दिया है। कविता संवेदना का संसार रचती है। कवि नीलम चंद सांखला ने मातृशक्ति को केन्‍द्र में रखकर अनुभूति का संसार रचा है। उक्त विचार काव्य संग्रह बाई का नजरिया का विमोचन करते हुए मारिशस के कथाकार पत्रकार राज हीरामन ने व्यक्त किया। अध्यक्षता छत्तीसगढ़ मित्र के संपादक डॉ. सुशील त्रिवेदी नें की।

समारोह का प्रारंभ अतिथियों के द्वारा दीप प्रज्वलन एवं मॉं सरस्वती के चित्र पर माल्यापर्ण से हुआ। अतिथियों का स्वागत मोतीमाला एवं तिलक चंदन से हुआ। छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष गिरीश पंकज नें स्वागत भाषण देते हुए कहा कि नीलम चंद सांखला के कवि रूप में हम आज परिचित हो रहे है। मुख्य अतिथि श्री राज हीरामन एवं अध्यक्ष डॉ.सुशील त्रिवेदी सहित मंचस्थ अतिथियों नें श्री सांखला की पुस्तक बाई का नजरिया का विमोचन किया विशिष्ठ अतिथि श्री रमेश नैयर नें कहा कि पुस्तक एवं साहित्यिक सृजन से समाज सुसंस्कृति होता है। श्री सांखला नें इस संस्कृति में महती योगदान किया है वे स्वयं न्यायाधीश है वे समाज के साथ न्याल करेंगे उन्होंने मॉं को समर्पित कवितायें दिल खोलकर लिखी है मॉं का दिल बच्चों के लिए धड़कता है, ईश्वर की जन्मदात्री है मॉं, बच्चियों के लिये लिखी गई कविताये भी कोमल दुनिया से परिचित कराती है।

गायक अभिजीत के साथ कवि नीलम चंद सांखला
कार्यक्रम में कवि नीलमचंद सांखला नें अपने इस संग्रह की रचना प्रक्रिया से अवगत कराया, उन्होंने कहा कि मॉं संसार के सभी दुखों से अनुभूत है, उन्हीं के प्रेरणा से कविता के शब्द प्रस्फुटित हुए हैं। मॉं नें मुझे जीवन जीने का नजरिया दिया। राजा और रंक का फर्क बताया। उन्‍होंनें आगे कहा कि आज बेटियों के अस्तित्व को बचाया जाना आवश्‍यक है। उन्होंने चुनिंदा कविताओं का पाठ किया। डॉ.प्रवीण गुप्ता के समीक्षा पत्र का पाठन ब्लागर संजीव तिवारी नें किया।

समीक्षक श्री अशोक सिंघई नें कहा कि बिखरती हुई दुनिया को कवि नें मॉं की ममता के साथ देखा परखा है। कवि नें ध्वनि के अनुशासन को शब्दों के माध्यम से बांधा है कवि ने भ्रूण-हत्या का दर्द को गहराई के साथ उकेरा है। तेन्दू पर कवि ने सूक्ष्म दृष्टि डाली है। उन्‍होंनें कहा कि कवि की कवितायें बोध-कथाओं की तरह तरल है। समीक्षक डॉ. अजय पाठक ने कहा कि कवित को पूरी तरह से परिभाषित नहीं किया जा सकता। कवि नीलमचंद सांखला ने जीवन-संघर्ष के साक्षात्कार को शब्द-रूप दिया है। उनके काव्य में गहरा आध्यात्मिक दर्शन भी है। उनकी कविता में छत्तीसगढ़ का गांव भी वृंदावन की तरह है। सांखला परिवार के वरिष्ठ सदस्‍य श्री भंवरलाल सांखला ने कहा कि श्री हीरामन जैसे हिन्‍दी के प्रेमियों नें हिन्दी को विश्व के कोने-कोने तक पहुंचाया है। इस अवसर पर उन्‍होंनें सरस्वती के संपादक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का भी स्मरण किया।

मुख्य अतिथि मारीशस के कथाकार संपादक राज हीरामन ने कहा कि मारीशस के लिए हिन्दी मॉं है। भारतवंशियों के लिए हिन्‍दी उनकी अस्मिता है। मैं भारत अपनी मॉं को देखने आया हूं। उन्‍हानें आगे कहा कि न्यायाधीश संवेदनशील होता है, श्री सांखला एक संवेदनशील कवि है उनकी कविता के केन्‍द्र में इंसान है। उन्होंने कहा कि हमारा समाज और हमारी सरकार मातृशक्ति का सम्मान नहीं करेगी, तब तक संस्कार पर खतरे रहेंगे। इस कविता में मॉं के प्रेम और स्नेह का संसार है। भारत के बेटों ने मारीशस को यूरोप के मुकाबले में खड़ा किया है।

समारोह के अध्यक्ष डॉ. सुशील त्रिवेदी ने कहा कि हिन्‍दी और गॉंधी मारीशस में जिंदा है। भारत में गांधी को तलाशना कठिन कार्य है। श्री राज हीरामन हिन्दी की ज्योति लेकर गांधी को तलाशने आए है। आज हमने बख्शी जी को रचनात्मक श्रद्धांजली दी है। कवि नीलमचंद सांखला एक स्वतंत्र कवि है। कवि की स्वायत्ता उसे लोकमंगल का अधिकारी बनाती है। कवि की अपनी अलग सत्ता होती है। कविता में भावजगत की सत्ता होती है। श्री सांखला की कवितायें नया अर्थ देती हैं मॉं प्रकृति पर्याय हैं सबसे ज्यादा हमला प्रकृति पर हो रहा है। इसी तरह आधुनिकता के नाम पर मॉं की सत्ता पर हमला हो रहा है। कार्यक्रम का सुंदर संचालन कु. पूर्वी सांखला ने तथा आभार प्रकट समिति के संचालक डॉ.सुधीर शर्मा ने किया अंत में स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया। समारोह में प्रो.के.रहमान, डॉ.आलोक शुक्ल, डॉ.श्याम सुंदर त्रिपाठी, राहुल सिंह, भंवर शुक्ल, जयप्रकाश मानस, रवि श्रीवास्तव, मुमताज, श्री भार्गव, मोहन चोपड़ा, डॉ. जे.आर.सोनी, अशोक शर्मा, ब्लॉगर संजीव तिवारी, विनोद शुक्ल, शंकरलाल श्रीवास्तव, इंदरचंद घाडीवाल, त्रयम्बक शर्मा, पद्मश्री भारती बंधु एवं सांखला परिवार के सदस्य उपस्थित थे। समारोह का समापन राष्ट्रगान से हुआ।






Wednesday, January 15, 2014

Bai Ka Nazariya

बाई का नज़रिया  -
मेरी प्रथम काब्य - संग्रह का  विमोचन  २८ / १२/ २०१३  को