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Sunday, November 24, 2013

तुम मुझे कैसे भुला पाओगी

तुम लाख भुलाना चाहो मुझे
तुमको मैं भुलाने नहीं दूंगा  

बॉंध को देखकर भूल मत करना
नदियों नें बहना भूल गयी

शहरों के महलों में घरौंदे बनते ना देख
ये मत समझना चिड़ियों नें चहकना छोड़ दिया

मुझे डराना नहीं आता तो क्या हुआ ?
लोग अब भी प्यार से डरा करते हैं

ख़्वाबों को सुबह भुला सकती हो तुम
मैं तो पलकों में बसा करता हूं

निगाहें कभी थकेंगी नहीं
इस मुगालते में मत रहना

जरा निगाहों की ओर तो देख ले
पलकों को इशारा कर दी है

निगाहों में तस्वीर किसी और की है
मगर झपकते पलक में तस्वीर मेरी है

मैं तुम्हारे दिल में नहीं
धड़कनों में बसा करता हूं

धड़कता दिल जिस्म से नहीं
धड़कनों से बात करता है

तुम धड़कनों को चाह कर भी रोक नहीं पाओगी
फिर कहो, कैसे ? 'तुम मुझे भुला पाओगी'

                                                                 नीलम चंद सांखला

1 comment:

Anonymous said...

nice bhav