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Wednesday, May 25, 2011

याद

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सूर्यास्त का वक्त
समुद्र का छोर ,
गुलशन की महक ,
प्रकृति --
अपनी सुन्दरता
बिखेर रही थी ।
उस वक्त मैं
वहीं लेटा हुआ
प्रकृति की सुन्दरता को
निहार रहा था ।
मन प्रफुल्लित ,
दिल खुश था ।
तभी पायल की
झंकार ने मुझे
अपनी ओर आक्रिस्ट की
मैं एकाएक चौंका
दिल की धरकन बढने लगी
जिस्म कांप उठा
जुबान रुक गए
और मेरी आँखें
उसे एक टक
यूँ देखने लगी
जैसे मेरी मनचाही
मुराद पूरी हो गयी हो ।
और मैं खुशी के मारे
बाँहों में बाहें डालकर
वहीँ एक ओर लेट गया
तभी मुझे लगा
वो
भीग गयी
मैं उसके जिस्म से
पानी पोछने लगा
तभी एक बार और चौंका
नींद से जागा
और देखा
मैं जिसके जिस्म से
पानी पोंछ रहा था
वो --कोई मन चाही
मुराद नहीं थी
बल्कि
बिस्तर का एक छोर था
जो उसकी याद में
मेरे आंसूओं से
भीग गए थे ।

Monday, May 9, 2011

’’मॉं’’

’’मॉं’’ कोई शब्द नहीं, बल्कि अनुभूति है , जीवन दर्शन की । मॉं एक ऐसा शब्द है जिसे सुनकर जिस्म का रोम रोम प्रफुल्लित हो उठता है । कई बार मन में यह विचार आता है कि आखिर मॉं में ऐसी कौन सी शक्ति है या यूं कहें कि ऐसी कौन सी खूबी है जो बरबस हर पल इन्सान का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है । हमने अक्सर देखा है कि महफिल में एक छोटा सा बच्चा जब अपने आप को भीड़ से परेशान पाता है और लोग भीड़ में हर दूसरे चाहने वालों से मिलने लालायित होते हैं तब उस छोटे बच्चे की निगाहें किसी ऐसे शख्स जिसमें समस्त शक्ति समाहित हो को ढूंढने के बजाए मॉं की निगाहों को शून्य में तलाशतें नजर आती है और जब वह मॉं से लिपट लेता है तब उसे लगता है कि मॉं के आंचल में या माँ के बाहों में उसने दुनिया की सारी खुशियों को समेट लिया है ।

कई बार मन में यह विचार आता है कि ’’मां’’ के बारे में इतना लिखूं या कहूँ तब वक्त की बंदिश लेखनी को रोककर यह कहती है कि वह जानता है कि हम मन के विचारों को मॉं को समर्पित करते हुए व्यक्त करेंगे तब इस पूरी पृथ्वी या धरती मॉं को कागज के पन्ने मान लिया जाए और कलम से लिखना प्रारंभ किया जाए तो मन के उद्गार शेष बचे रहेंगे और इस दुनिया रूपी कागज के पन्ने समाप्त हो जायेंगें , तब मन में बार बार यह ख्याल आता है कि क्यूं न हम अपने उद्गार को चंद पंक्ति में कुछ ऐसे बयान करें कि हर शब्द हजारों पन्नों के भाव को बता सके किसी ने कहा है कि ’’गागर में सागर’’ तब ऐसे विचार यदि गागर में सागर है तो मन के विचार को व्यक्त करना न सिर्फ आसान होगा बल्कि उसके भाव को पढ़ने के लिए समूची दुनियानुमा किताब को पढ़ने की बजाए चंद लब्ज को पढ़कर अपने जीवन में आत्मसात करने से मां की महिमा का आंकलन इन्सान स्वयं कर सकता है ।
किसी कवि ने कहा है कि -

गुरू गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाये ।
बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताये ।।

हिन्दुस्तान की परम्परा ऐसी रही है कि गुरू को भगवान से ऊंचा दर्जा दिया गया है गुरू से तात्पर्य उस इन्सान से है जो हमें जीवन के पथ पर हमें सही दिशा में चलने की राह दिखाता है जब इन्सान इस दुनिया में जन्म लेता है तब उसके निगाह के सामने ’’मॉं’’ के अलावा कोई नहीं रहता । जीवन का पहला ज्ञान या दर्शन उस अबोध बालक को मॉं ही देती है तब हम ऐसा नहीं कह सकते कि मां ही गुरू है किन्तु मॉं ने गुरू की मंजिल की अंतिम सीढ़ी में पहुंचने के लिए एक सीढ़ी सा रास्ता दिखाती है, तब मॉ विधाता के करीब प्रतीत होने लगती है ।

विधाता ने इस दुनिया में प्रकृति को बनाई है । विधाता प्रकृति और माँ की व्याख्या में हजारों शब्द लग सकते हैं तब मेरे मन में विचार आया कि -

विधाता का सुन्दर सृजन है
प्रकृति ।
प्रकृति की उपहार है,
मॉं ।
मॉं ही प्रकृति है,
प्रकृति ही मॉं है ।


मां के बारे में जब वर्णन करते हैं तब प्रश्न उठता है कि हमने कितने
पल या बरस मॉ के साथ गुजारे हैं एक इन्सान सौ बरस तक जीता है और वह कुछ भी हासिल नहीं करता और एक इन्सान 25 बरस जीकर सब कुछ हासिल कर लेता है । तब हम कहेंगे कि लम्बा जीवन सब कुछ पाने का पैमाना नहीं है । समय की लंबाई ही जीवन को समझने का आधार नहीं हो सकता । कई बार मेरे मन में यह विचार आता है कि बहुत से लोगों को तो ताउम्र माँ का प्यार नहीं मिला, और उनके जीवन के कुछ वर्ष में ’’मॉं’’ उनसे जुदा हो गयी । मेरी माँ जब मैं 27 बरस का था तो इस दुनिया से दूर चली गई तब मेरे मन में विचार आता है कि क्या 27 बरस का साथ मेरे लिए पर्याप्त है या नहीं फिर मन के किसी कोने से आवाज आने लगी कि साथ आखिर होता क्या है -

’’साथ’’
मैं मॉं के साथ रहा
27 बरस
मॉं मेरे जहन में
अब भी मेरे साथ है
क्या ये कम है ?
मॉं का साथ मेरे लिए ।
मॉं को मैं घर में ’’बाई’’ कहकर पुकारता था । मॉं का नाम धापी बाई था । अंग्रेजी में मॉं को मदर कहते हैं , हर जुबा में मॉं के लिए कई शब्द हैं, अम्मी , ताई, और न जानें कितने शब्द हर भाषा का अपना शब्द है लेकिन उसका अर्थ ’’मॉं’’ है । कई बार मैं यह सोचता रहता हूं कि ’’मॉं’’ शब्द का कोई विकल्प तलाशॅूं या यह सोंचूं कि मॉं आखिर होती क्या है उसके लिए और कोई शब्द ढूंढकर लाऊॅं तो मेरा मन पक्षियों के पर लगाकर ब्राम्हाण में उड़ने लगा और सोचने लगा तब जो विचार आया उसे मैं यहां व्यक्त कर रहा हूं ।

एक बच्चे के लिए उसका पिता
दोस्त या दुश्मन हो सकता है ।
दोस्त कभी दुश्मन,
दुश्मन कभी दोस्त हो सकता है ।
अपने पराये,
पराये अपने हो सकते हैं ।
वह आज कुछ है,
कल कुछ हो सकता है ।
मैं आज कुछ और हूं ,
कल कुछ और हो सकता हूं ।
मॉं जो कल मॉं थी
आज भी मां है
कल भी मां ही रहेगी ।
एक बाप के लिए उसका बेटा
सपूत या कपूत हो सकता है ।
सपूत या कपूत बेटे के लिए
’’मॉं’’, ’’मॉं’’ होती है ।
एक बच्चे के लिए उसकी मॉं
अच्छी या बुरी हो सकती है ।
अच्छे या बुरे बच्चे के लिए
मॉं, ’’मॉं’’ होती है ।
मॉं का कोई शब्द नहीं ,
मॉं का कोई अर्थ नहीं
मॉं, ’’मॉं’’ होती है
मॉं, ’’मॉं’’ होती है ।

मॉं में ममत्व की खान होती है । कभी वह त्याग की मूरत होती है तो कभी उसके समर्पण के भाव देखते ही बनते हैं । कई बार मैं सोचता हूं कि मॉं का उसके बेटे व पति के बीच आखिर समर्पण व त्याग की क्या गहराई होती है । मन में जेट विमान से भी दु्रतगति से आसमान को खंगालते हुए अनगिनत शब्द के बौछार होते हैं मस्तिष्क पटल पर, तभी दिल के एक कोने से आवाज आई कि:-

मॉं का
उसके पति के प्रति प्यार में, उतना ही समर्पण है
जितना, मॉं का
बेटे के प्यार में त्याग ।

मॉं के इस रूप से लगता है कि प्यार की परिभाषा , समर्पण और त्याग के बिना अधूरी है । समर्पण, त्याग, प्यार में समाहित ही है ।

मेरा एक भाई जिसे हम बहुत प्यार से ’’भीखम भैय्या’’ कहकर पुकारते थे । मैंनें भीखम भैय्या की निगाहों में अपने परिवार के प्रति स्नेह, समर्पण देखा तब मन में यह विचार आया कि मॉं सिर्फ नारी का रूप है । यह शाश्वत सच है कि मॉ का स्थान anya कोई व्यक्ति नहीं ले सकता किन्तु ऐसे भाई या इन्सान को क्या कहें तभी दिल से आवाज आई कि --

मॉं
सिर्फ नारी का रूप नहीं है
यदि भाई के स्नेह में
’’मॉं’’ का एहसास हो
तब वह भाई भी
’’मॉं’’ का प्रतीक है ।

हमारे देश में दोस्त की जगह सगे रिश्तेदार से कहीं अधिक है , 14 फरवरी को लोग ’’फैण्डशीप डे’’ मनाते हैं । मन में यह विचार आता है कि दोस्त व दोस्ती से मॉं का क्या संबंध है । मन के विचारों को शब्दसः ब्यान करने में फिर हजारों पन्ने लगेंगे तभी दिल से जो उद्गार निकला वह इस प्रकार है -

जब,
सारे अपने व दोस्त
मुंह मोड़ ले
तब,
’’मॉं’’ माने
दोस्ती का एहसास ।

Sunday, May 8, 2011

माँ दिवस -धापी

धापी माने
सिर्फ धापना नहीं है ,
धापी माने ---
" ध " से धन
" प " से पाना नहीं है ।
धापी माने
" ध " से धरा माने धरती माँ
और
" प " माने पलना
अर्थात
धापी माने
माँ के गोद में पलना है ।

माँ -दिवस






माँ दिवस --यदि हम धरती को लपेटकर कागज़ की तरह उपयोग कर माँ के बारे में अपना भाव व्यक्त करना चाहें तो - भी ,भाव शेष रह जायेंगे ।

माँ माँ होती है --

एक बच्चे के लिए , उसका पिता
दोस्त या दुश्मन हो सकता है ।
दोस्त कभी दुश्मन , दुश्मन कभी दोस्त हो सकता है
अपने पराये , पराये अपने हो सकते है ।
वह आज कुछ और है , कल कुछ और हो सकता है ।
मैं आज कुछ और हूँ , कल कुछ और हो सकता हूँ ।
माँ - जो कल माँ थी ,
आज भी माँ है ,
कल भी माँ रहेगी ।
एक पिता के लिए उसका बेटा ,
सपूत या कपूत हो सकता है ।
एक सपूत या कपूत बेटे के लिए ,
माँ --माँ होती है ।
एक बच्चे के लिए उसकी माँ ,
अच्छी या बुरी हो सकती है ।
अच्छे या बुरे बच्चे के लिए ,
माँ --माँ होती है ।
माँ का कोई अर्थ नहीं ,
माँ के लिए , कोई शब्द नहीं ,
माँ -- माँ होती है , माँ होती है ।

माँ - दिवस ---साथ

मै
माँ के साथ रहा
सत्ताईस बरस

माँ मेरे जहन में

अब भी मेरे साथ है ,
क्या ये कम है -
माँ का साथ
मेरे लिए ।