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Thursday, January 13, 2011

प्यार संग समर्पण और त्याग



मेरे लिए १३ जनवरी की तिथि का बहुत महत्त्व है । १३.०१.१९९४ को मेरे पिता श्री कंवरलाल जी सांखला , जिन्हें हम भायजी कहकर पुकारते थे , इस दुनिया में नहीं रहें । आज भायजी की पूण्य तिथि है । भायजी का मेरे गाँव छुईखदान में शिक्षा के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान है । सन १९५० -१९६० में जब हमारे देश में गाँव में हाई स्कूल नहीं हुआ करता था तब मेरे गाँव में ' जनता हायर सेकेंडरी ' स्कूल के स्थापना में भायजी का महत्व पूर्ण योगदान था । भायजी स्कूल के अध्यक्ष भी रहे।



माँ जिसे हम घर में 'बाई' कहकर पुकारते थे , का मैंने प्यार के कई रूप देखे थे । तब मेरे मन में बार -बार विचार आता था , आखिर क्या pyar समर्पण के बिना संभव है ? क्या समर्पण त्याग बिना हो सकता है ।



प्यार , त्याग और समर्पण को समझने में बरसों बीत जायेंगें । आओ आज मैं इसकी इक नयी परिभाषा बताऊँ --

माँ

का

पिता के प्रति

प्यार में

उतना ही

समर्पण है ,

जितना

माँ

का

बेटे

के प्रति

प्यार में

त्याग ।


भायजी ( स्व.श्री कँवर लाल जी ) और बाई ( स्व .श्रीमती धापी बाई ) की १९४२ की दुर्लभ चित्र ।

3 comments:

ali said...

पूज्य भाय जी को शत शत नमन , उनका व्यक्तित्व प्रेरणा दाई है !
समर्पण और त्याग की परिभाषा सराहनीय है !

ललित शर्मा said...

माई तु एसो पूत जण,कै दाता कै सूर।
या तो तु रह बांझड़ी, मति गंवावे नूर।।

बहुत कम लोग दुनिया में ऐसे होते हैं जो रेत पर कदमों के चिन्ह छोड़ जाते हैं। उनका प्रत्येक कदम अनुकरणीय होता है।

भाय जी को नमन

Anonymous said...

bhai ji... pranaam