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Thursday, November 3, 2011

दर्द की अनुभूति

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

लंबे समय से निजी कारणो से ब्लाग में नहीं आ सका था ।
दिनांक 30/10/2011 को भिलाई में ब्लाग लिखने वालों का सम्मेलन था , उक्त सम्मेलन में मैं सम्मिलित होने शाम को जा रहा था तब माँ के बारे में कुछ विचार आने लगे और अंततः उक्त विचार एक लेखनी को जन्म दे गई:-

दर्द की अनुभूति
मृत्यु शास्वत सच है , किन्तु
माँ की मृत्यु
दे जाती है अनुभूति ,
दर्द की ।
खुद के दर्द के लिये
अपनों का दर्द जानना आवश्यक है ।
अपनों के दर्द की अनुभूति ,
गैरो के दर्द की अनुभूति ,
बिना संभव नहीं ।
इंसान जुंबा का स्वामी है ,
इंसान के दर्द की अनुभूति
बेजुबान के दर्द की अनुभूति-बिना
संभव नहीं ।।

Saturday, September 3, 2011

क्षमा

खामेमि सव्वे जीवा
सव्वे जीवा खमंतुमें ।
‘‘ क्षमा पर्व ‘‘
‘ क्षमा वीरस्य भूषण ‘
क्षमा मांगने वाले और क्षमा देने वाला दोनों ही साधूवाद के पात्र हैं। जब तक व्यक्ति विवेकवान नहीं होगा उसका अहंम उसे क्षमा मांगने से रोकेगा इसी प्रकार जब तक व्यक्ति सहनशील नहीं होगा वह क्षमा प्रदान नहीं करेगा ।
क्षमा ‘ कसाय ‘ को शांत करने की औषधी है । क्षमा क्रोध की ज्वाला को शांत करता है। अग्नि की ज्वाला तो दूसरों को जलाती है किंतु क्रोध की ज्वाला पहले हमें जलाती है उसके बाद औरों को ।
पर्यूषण के इस महापर्व पर मैं आप सभी से ज्ञात/अज्ञात रूप में आपको मन वचन और काया से जो ठेंस पहुंचायी हो उसके लिये तहे दिल से क्षमा प्रार्थी हॅू और आशा करता हूँ कि आप मेरे उक्त कृत्य के लिये मुझे क्षमा प्रदान करगें क्योकि आपका दिल विशाल है तभी तो मैं यह कह सकता हूँ
कि
असंभव है
गल्तियां ना करना
किन्तु
संभव है
क्षमा ।

Tuesday, August 16, 2011

१५ मिनट में स्वतंत्रता

सिर्फ 30 मिनट में स्वतंत्रता
कल रात दिनांक 15/08/2011 को जब सारा देश स्वतंत्रता दिवस की खुशिया मनाने में व्यस्थ्त था तभी रात के 8.30 बजे मेरे मोबाईल में लखनऊ (उ.प्र.) से श्री सुरेश सिंह ढ़पोला जो एक स्वयं सेवी संस्था नवजीवन से जुड़े है और जिन्होंने वर्तमान में रास्ते में जो लोग मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं दिखते उनकी संस्था में ले जाकर उनके पुनर्रउत्थान के लिये कार्य कर रहे है , का फोन आया कि एक पुलिसवाला उनकी संस्था में 14 , 15 साल की एक लड़की को लेकर आया है और उन्होने उनके बारे में मुझे संक्षिप्त जानकारी देकर लड़की से बात करने को कहा तब मैने उक्त लड़की से बात की तब उसका नाम कुमारी निशी कुमारी साहू पिता-राजकुमार साहू माता श्रीमति सरोज साहू ग्राम-कटई या पटई थाना-नवागढ़ जिला-दुर्ग
छ.ग. का होना बतायी उक्त लड़की बहुत अच्छे से प्रश्न का जवाब नही दे पा रही थी तब श्री ढ़पाला ने कहा कि लड़की की उम्र लगभग 14 , 15 साल की है और वह मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ प्रतीत नहीं होती और श्री ढ़पोला ने मुझसे इस संबंध में कुछ करने को कहा ।
उसी वक्त मैने श्री अरविंद दास आरक्षक जो न्यायालय में मुहर्ररीर आरक्षक था से बात कर नवागढ़ टी.आई. और एस.पी. साहब का मोबाईल नंबर लिया उसके बाद मैने श्री के.पी. बंजारे नवागढ़ टी.आई. और श्री अमित कुमार साहब पुलिस अधीक्षक दुर्ग से फोन में बात की और उन्हे श्री ढपोला का नंबर दिया ।
कुछ ही समय बाद फिर मोबाईल में जानकारी मिली कोटवार को गांव भेज दिया गया है और कोटवार से उक्त लड़की की जानकारी जुटा कर उसकी दादी से बात करायी गई और पता चला कि लड़की के माता पिता लखनऊ में ही मजदूरी करने गये है श्री ढ़पोला ने फिर जानकारी दी कि लड़की के पिता से संपर्क नहीं हो पा रहा है , किन्तु मेसेज कर दिया गया है ।
आज दिनांक 16-08-2011 दोपहर में फिर फोन आया कि लड़की के पिता श्री ढ़पोला के पास बैठे हुऐ है और उनसे बात हुई और उन्हे बताया कि उनकी लड़की 14/08/2011 से कही गई हुई थी आज वे रिपोर्ट लिखाने जाते ।
फिर लड़की के पिता श्री राजकुमार साहू मुझे शुक्रिया कर रहा था , जबकि शुक्रिया का वाजिब हकदार तो श्री सुरेश सिंह ढपोला (लखनऊ) और पुलिस वाले जिसमें मुख्य रूप से पुलिस अधीक्षक श्री अमित कुमार जिला- दुर्ग , टी.आई. श्री के.पी.बंजारे और आरक्षक श्री अरविंद दास है ।
श्री राजकुमार साहू की बातो से मुझे एैसा लगा कि अपने क्षेत्र में भी एैसी संस्थाऐ होनी चाहिये जो मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति की जिसमें राह चलते लोग शामिल है और नशे की हालत से जो लोगो की स्थिती खराब हो गई है उसे छुड़ाने में कारगर साबित होती है ।
एक पल के लिये एैसा लगा कि स्वतंत्रता दिवस में सिर्फ 30 मिनट में ही उक्त लड़की को स्वतंत्रता दिला दी गई । सभी के सहयोग की मैं तहेदिल से शुक्रगुजार हॅू और आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की बधाई देता हॅू ।
लडकी ,उसके पिता से छत्तीसगढ़ी में बात करने से सही जानकारी मिल सकी । छत्तीसगढ़ी भाषा का ज्ञान होना आज सुखद अनभूति दे गया .

Sunday, July 24, 2011

पैसा - एक नजरिया यह भी

हमने अक्सर सुना है , कि कुछ लोगो के लिये पैसा सब कुछ है , कुछ लोगों की मान्यता यह है कि पैसा सब कुछ नहीं किन्तु महत्वपूर्ण है । जहॉं तक मेरी विचारधारा है , न तो मैं पूरी तरह इस बात से सहमत हॅू कि जीवन में पैसा ही सब कुछ है या पैसा का स्थान जीवन में सबसे ऊपर रहा है । किंतु सांसारिक जीवन में पैसे के महत्व से इंकार भी नहीं किया जा सकता । जीने के लिये पैसा आवश्यक है । यह आवश्यकता उसी प्रकार से है जिस प्रकार से जीवन के लिये भोजन का महत्व होता है । भोजन कितना अच्छा है , यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि जो भोजन हम ग्रहण कर रहे है , वह किस आय के साधन से पकाया गया है , यह महत्वपूर्ण है , क्योकि अनैतिक साधनो से अर्जित धन से यदि अच्छा भोजन ग्रहण किया जाये तो भी यह शरीर के लिये बलकारी होते हुऐ भी मन को शांति देने वाला या चित्त को स्थिर करने वाला नहीं हो सकता , क्योकि चित्त की स्वाभाविक प्रकृति अनैतिकता से जुडे कार्य को मन में स्वाभाविक रूप से स्थान देने का नहीं हो सकता ।

जीवन में यह कतई आवश्यक नहीं है कि हम अनैतिक साधनों से ही धन बटोरें , हम अपने कार्य को करते हुऐ जो नैतिक साधनों से धन इकटठा करते है , यदि उसका उपभोग और विनियोग विवेकपूर्ण तरीके से किया जाये तब पैसे से पैसा बनाया जा सकता है । ऐसा हो सकता है कि हमारे पास अटूट (अपार) धन न हो किन्तु हम यदि स्वयं की तुलना दूसरो से न कर खुद से करे तो पायेगे कि हमारे पास न सिर्फ पर्याप्त धन है , बल्कि धन के साथ संतोष और शांति भी है , जो अनैतिक रूप से कमाये व्यक्ति के अटूट धन से कही ज्यादा महत्वपूर्ण हमारा धन होगा ।

कई बार मेरे मन में विचार आता है कि विवेकपूर्ण धन का विनियोग कैसे हो। आखिर विेवेक से धन का उपयोग और विनियोग कैसे किया जाये , इस संबंध में मैने


ईश्वर , गुरू , मॉं के अलावा अपने भाई स्वर्गीय श्री भीखम भैय्या से जो कुछ सीखा है उसे शब्दो में व्यक्त करने में कई सौ शब्दों का उपयोग करना होगा और फिर भी मन की बात नहीं बता पाउंगा , इसलिये इसे अपने चंद पक्ति के माध्यम से व्यक्त कर रहा हॅू -

पैसा जोड़ने से जुड़ता नहीं
पैसा खर्च करने से कम होता नहीं
जहां जायज हो वहां सौ रूपये खर्च कम है
जहां जायज नहीं हो वहां एक रूपये का खर्च व्यर्थ है
मनी मेक्स मनी ,
नो रिस्क नो गेन
नो एकाउण्ट नो प्रोग्रेस
नो प्लान नो फियुचर

Friday, July 22, 2011

मुकेश

मुकेश कोई शब्द नहीं
अनुभूति है , दर्द की
वो गीत ही क्या
जिसमे कशिश नहीं
वो आवाज़ ही क्या
जो मुकेश की नहीं ।

------मुकेश मेरा प्रिय गायक है । मुकेश की आवाज़ से मुझे आत्मीय खुशी मिलती है। मुकेश के गाने के बोल जीवन दर्शन के साथ प्रकृति की सुन्दरता को भी बयां करती है ----
१। सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी सच है दुनिया वालों हम है अनाड़ी
२ हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है
३ ये कौन चित्र कार है
४ भूली हुई यादों मुझे इतना ना सतायो अब चैन से रहने दो मेरे पास ना आओ

Friday, July 15, 2011

maa ke saman

मॉं के समान

दुनिया में हुबहू दो चेहरे एक जैसे हो ऐसा प्रसंग बहुत कम मिलता है , और मैं मन की बात कहूं , तो नहीं मिलता है । जुड़वां बच्चों की सूरत एक जैसी दिखती हैं किन्तु घ्यान पूर्वक देखने पर उनके चेहरों को भी एक दूसरे से भिन्न बताया जा सकता है जैसे थोडी नाक की बनावट में भिन्नता हो या हो सकता है बोलने का तरीका भिन्न हो । फिर भी जिनकी सूरत दूसरे व्यक्ति की सूरत से मिलती है तब एक व्यक्ति को देखने पर हमें दूसरे व्यक्ति की सूरत या नाम याद आ जाता है ।




किन्तु ऐसा प्रसंग बहुत कम मिलता है जब दो व्यक्तियों की सूरत एक दूसरे से नहीं मिलती हो तब भी एक व्यक्ति से रूबरू होने पर दूसरे व्यक्ति की याद अनायास जहन में उभरती हो ।
मेरी अपनी मान्यता है , यदि हम सिर्फ ऑखों से देखते है , तो दो भिन्न सूरत वाले व्यक्ति में समानता नजर नहीं आयेगी अर्थात एक व्यक्ति की सूरत दूसरे को याद नहीं दिलायेगी किन्तु जब हम मन की ऑखो से भी देखते है तब एक व्यक्ति के सारे व्यक्तित्व की कुछ झलक जब दूसरे व्यक्ति की सूरत में थोडी भी नजर आ जाती है तब दूसरा व्यक्ति सहज ही याद आ जाता है ।


मैं जब भी सामने वाली काकीजी से मिलता था तो यूं लगता था उनके पास ही रहूं क्योंकि उनके समीप रहने पर मुझे जो खुशी मिलती थी उसे मैं शब्दों में बयां नही कर सकता । मन के उद्गार को कुछ यूं बयां कर रहा हॅू -



जिस नारी
की
सूरत
जन्म देने वाली
मां

की याद दिलाए
वह नारी भी
मॉ

के समान है ।।

Wednesday, May 25, 2011

याद

--------------
सूर्यास्त का वक्त
समुद्र का छोर ,
गुलशन की महक ,
प्रकृति --
अपनी सुन्दरता
बिखेर रही थी ।
उस वक्त मैं
वहीं लेटा हुआ
प्रकृति की सुन्दरता को
निहार रहा था ।
मन प्रफुल्लित ,
दिल खुश था ।
तभी पायल की
झंकार ने मुझे
अपनी ओर आक्रिस्ट की
मैं एकाएक चौंका
दिल की धरकन बढने लगी
जिस्म कांप उठा
जुबान रुक गए
और मेरी आँखें
उसे एक टक
यूँ देखने लगी
जैसे मेरी मनचाही
मुराद पूरी हो गयी हो ।
और मैं खुशी के मारे
बाँहों में बाहें डालकर
वहीँ एक ओर लेट गया
तभी मुझे लगा
वो
भीग गयी
मैं उसके जिस्म से
पानी पोछने लगा
तभी एक बार और चौंका
नींद से जागा
और देखा
मैं जिसके जिस्म से
पानी पोंछ रहा था
वो --कोई मन चाही
मुराद नहीं थी
बल्कि
बिस्तर का एक छोर था
जो उसकी याद में
मेरे आंसूओं से
भीग गए थे ।

Monday, May 9, 2011

’’मॉं’’

’’मॉं’’ कोई शब्द नहीं, बल्कि अनुभूति है , जीवन दर्शन की । मॉं एक ऐसा शब्द है जिसे सुनकर जिस्म का रोम रोम प्रफुल्लित हो उठता है । कई बार मन में यह विचार आता है कि आखिर मॉं में ऐसी कौन सी शक्ति है या यूं कहें कि ऐसी कौन सी खूबी है जो बरबस हर पल इन्सान का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है । हमने अक्सर देखा है कि महफिल में एक छोटा सा बच्चा जब अपने आप को भीड़ से परेशान पाता है और लोग भीड़ में हर दूसरे चाहने वालों से मिलने लालायित होते हैं तब उस छोटे बच्चे की निगाहें किसी ऐसे शख्स जिसमें समस्त शक्ति समाहित हो को ढूंढने के बजाए मॉं की निगाहों को शून्य में तलाशतें नजर आती है और जब वह मॉं से लिपट लेता है तब उसे लगता है कि मॉं के आंचल में या माँ के बाहों में उसने दुनिया की सारी खुशियों को समेट लिया है ।

कई बार मन में यह विचार आता है कि ’’मां’’ के बारे में इतना लिखूं या कहूँ तब वक्त की बंदिश लेखनी को रोककर यह कहती है कि वह जानता है कि हम मन के विचारों को मॉं को समर्पित करते हुए व्यक्त करेंगे तब इस पूरी पृथ्वी या धरती मॉं को कागज के पन्ने मान लिया जाए और कलम से लिखना प्रारंभ किया जाए तो मन के उद्गार शेष बचे रहेंगे और इस दुनिया रूपी कागज के पन्ने समाप्त हो जायेंगें , तब मन में बार बार यह ख्याल आता है कि क्यूं न हम अपने उद्गार को चंद पंक्ति में कुछ ऐसे बयान करें कि हर शब्द हजारों पन्नों के भाव को बता सके किसी ने कहा है कि ’’गागर में सागर’’ तब ऐसे विचार यदि गागर में सागर है तो मन के विचार को व्यक्त करना न सिर्फ आसान होगा बल्कि उसके भाव को पढ़ने के लिए समूची दुनियानुमा किताब को पढ़ने की बजाए चंद लब्ज को पढ़कर अपने जीवन में आत्मसात करने से मां की महिमा का आंकलन इन्सान स्वयं कर सकता है ।
किसी कवि ने कहा है कि -

गुरू गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाये ।
बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताये ।।

हिन्दुस्तान की परम्परा ऐसी रही है कि गुरू को भगवान से ऊंचा दर्जा दिया गया है गुरू से तात्पर्य उस इन्सान से है जो हमें जीवन के पथ पर हमें सही दिशा में चलने की राह दिखाता है जब इन्सान इस दुनिया में जन्म लेता है तब उसके निगाह के सामने ’’मॉं’’ के अलावा कोई नहीं रहता । जीवन का पहला ज्ञान या दर्शन उस अबोध बालक को मॉं ही देती है तब हम ऐसा नहीं कह सकते कि मां ही गुरू है किन्तु मॉं ने गुरू की मंजिल की अंतिम सीढ़ी में पहुंचने के लिए एक सीढ़ी सा रास्ता दिखाती है, तब मॉ विधाता के करीब प्रतीत होने लगती है ।

विधाता ने इस दुनिया में प्रकृति को बनाई है । विधाता प्रकृति और माँ की व्याख्या में हजारों शब्द लग सकते हैं तब मेरे मन में विचार आया कि -

विधाता का सुन्दर सृजन है
प्रकृति ।
प्रकृति की उपहार है,
मॉं ।
मॉं ही प्रकृति है,
प्रकृति ही मॉं है ।


मां के बारे में जब वर्णन करते हैं तब प्रश्न उठता है कि हमने कितने
पल या बरस मॉ के साथ गुजारे हैं एक इन्सान सौ बरस तक जीता है और वह कुछ भी हासिल नहीं करता और एक इन्सान 25 बरस जीकर सब कुछ हासिल कर लेता है । तब हम कहेंगे कि लम्बा जीवन सब कुछ पाने का पैमाना नहीं है । समय की लंबाई ही जीवन को समझने का आधार नहीं हो सकता । कई बार मेरे मन में यह विचार आता है कि बहुत से लोगों को तो ताउम्र माँ का प्यार नहीं मिला, और उनके जीवन के कुछ वर्ष में ’’मॉं’’ उनसे जुदा हो गयी । मेरी माँ जब मैं 27 बरस का था तो इस दुनिया से दूर चली गई तब मेरे मन में विचार आता है कि क्या 27 बरस का साथ मेरे लिए पर्याप्त है या नहीं फिर मन के किसी कोने से आवाज आने लगी कि साथ आखिर होता क्या है -

’’साथ’’
मैं मॉं के साथ रहा
27 बरस
मॉं मेरे जहन में
अब भी मेरे साथ है
क्या ये कम है ?
मॉं का साथ मेरे लिए ।
मॉं को मैं घर में ’’बाई’’ कहकर पुकारता था । मॉं का नाम धापी बाई था । अंग्रेजी में मॉं को मदर कहते हैं , हर जुबा में मॉं के लिए कई शब्द हैं, अम्मी , ताई, और न जानें कितने शब्द हर भाषा का अपना शब्द है लेकिन उसका अर्थ ’’मॉं’’ है । कई बार मैं यह सोचता रहता हूं कि ’’मॉं’’ शब्द का कोई विकल्प तलाशॅूं या यह सोंचूं कि मॉं आखिर होती क्या है उसके लिए और कोई शब्द ढूंढकर लाऊॅं तो मेरा मन पक्षियों के पर लगाकर ब्राम्हाण में उड़ने लगा और सोचने लगा तब जो विचार आया उसे मैं यहां व्यक्त कर रहा हूं ।

एक बच्चे के लिए उसका पिता
दोस्त या दुश्मन हो सकता है ।
दोस्त कभी दुश्मन,
दुश्मन कभी दोस्त हो सकता है ।
अपने पराये,
पराये अपने हो सकते हैं ।
वह आज कुछ है,
कल कुछ हो सकता है ।
मैं आज कुछ और हूं ,
कल कुछ और हो सकता हूं ।
मॉं जो कल मॉं थी
आज भी मां है
कल भी मां ही रहेगी ।
एक बाप के लिए उसका बेटा
सपूत या कपूत हो सकता है ।
सपूत या कपूत बेटे के लिए
’’मॉं’’, ’’मॉं’’ होती है ।
एक बच्चे के लिए उसकी मॉं
अच्छी या बुरी हो सकती है ।
अच्छे या बुरे बच्चे के लिए
मॉं, ’’मॉं’’ होती है ।
मॉं का कोई शब्द नहीं ,
मॉं का कोई अर्थ नहीं
मॉं, ’’मॉं’’ होती है
मॉं, ’’मॉं’’ होती है ।

मॉं में ममत्व की खान होती है । कभी वह त्याग की मूरत होती है तो कभी उसके समर्पण के भाव देखते ही बनते हैं । कई बार मैं सोचता हूं कि मॉं का उसके बेटे व पति के बीच आखिर समर्पण व त्याग की क्या गहराई होती है । मन में जेट विमान से भी दु्रतगति से आसमान को खंगालते हुए अनगिनत शब्द के बौछार होते हैं मस्तिष्क पटल पर, तभी दिल के एक कोने से आवाज आई कि:-

मॉं का
उसके पति के प्रति प्यार में, उतना ही समर्पण है
जितना, मॉं का
बेटे के प्यार में त्याग ।

मॉं के इस रूप से लगता है कि प्यार की परिभाषा , समर्पण और त्याग के बिना अधूरी है । समर्पण, त्याग, प्यार में समाहित ही है ।

मेरा एक भाई जिसे हम बहुत प्यार से ’’भीखम भैय्या’’ कहकर पुकारते थे । मैंनें भीखम भैय्या की निगाहों में अपने परिवार के प्रति स्नेह, समर्पण देखा तब मन में यह विचार आया कि मॉं सिर्फ नारी का रूप है । यह शाश्वत सच है कि मॉ का स्थान anya कोई व्यक्ति नहीं ले सकता किन्तु ऐसे भाई या इन्सान को क्या कहें तभी दिल से आवाज आई कि --

मॉं
सिर्फ नारी का रूप नहीं है
यदि भाई के स्नेह में
’’मॉं’’ का एहसास हो
तब वह भाई भी
’’मॉं’’ का प्रतीक है ।

हमारे देश में दोस्त की जगह सगे रिश्तेदार से कहीं अधिक है , 14 फरवरी को लोग ’’फैण्डशीप डे’’ मनाते हैं । मन में यह विचार आता है कि दोस्त व दोस्ती से मॉं का क्या संबंध है । मन के विचारों को शब्दसः ब्यान करने में फिर हजारों पन्ने लगेंगे तभी दिल से जो उद्गार निकला वह इस प्रकार है -

जब,
सारे अपने व दोस्त
मुंह मोड़ ले
तब,
’’मॉं’’ माने
दोस्ती का एहसास ।

Sunday, May 8, 2011

माँ दिवस -धापी

धापी माने
सिर्फ धापना नहीं है ,
धापी माने ---
" ध " से धन
" प " से पाना नहीं है ।
धापी माने
" ध " से धरा माने धरती माँ
और
" प " माने पलना
अर्थात
धापी माने
माँ के गोद में पलना है ।

माँ -दिवस






माँ दिवस --यदि हम धरती को लपेटकर कागज़ की तरह उपयोग कर माँ के बारे में अपना भाव व्यक्त करना चाहें तो - भी ,भाव शेष रह जायेंगे ।

माँ माँ होती है --

एक बच्चे के लिए , उसका पिता
दोस्त या दुश्मन हो सकता है ।
दोस्त कभी दुश्मन , दुश्मन कभी दोस्त हो सकता है
अपने पराये , पराये अपने हो सकते है ।
वह आज कुछ और है , कल कुछ और हो सकता है ।
मैं आज कुछ और हूँ , कल कुछ और हो सकता हूँ ।
माँ - जो कल माँ थी ,
आज भी माँ है ,
कल भी माँ रहेगी ।
एक पिता के लिए उसका बेटा ,
सपूत या कपूत हो सकता है ।
एक सपूत या कपूत बेटे के लिए ,
माँ --माँ होती है ।
एक बच्चे के लिए उसकी माँ ,
अच्छी या बुरी हो सकती है ।
अच्छे या बुरे बच्चे के लिए ,
माँ --माँ होती है ।
माँ का कोई अर्थ नहीं ,
माँ के लिए , कोई शब्द नहीं ,
माँ -- माँ होती है , माँ होती है ।

माँ - दिवस ---साथ

मै
माँ के साथ रहा
सत्ताईस बरस

माँ मेरे जहन में

अब भी मेरे साथ है ,
क्या ये कम है -
माँ का साथ
मेरे लिए ।

Sunday, February 13, 2011

माँ माने त्याग और प्यार









सर पर गागर रखकर




कुंए से पानी लाने वाली




लालटेन की रौशनी से




बिजली की रौशनी को




धता दिखाने वाली




बच्चों की परवरिश में




अपने सुखों का




न्योझावर करने वाली




अपने कोख से




साध्वी को जनने वाली




माँ तुझे त्याग की




मूरत कहूँ




या




प्यार लूटाने वाली




सागर ।





( छोटी काकीजी माने स्वर्गी श्रीमती रेशमी बाई सांखला से जुडी कुछ बातें आओ आज तुम्हे बताऊँ ---संचेती खानदान ,कोरना , राजस्थान से सांखला खानदान में आई थी । पति स्वर्गी श्री गेंद मल जी , पुत्र - उत्तम , सुरेश ,जेठमल ,---पुत्री -बिमला ( जो अब विनय श्री के रूप में आचार्य नानेश -रामेश, के सानिध्य में जैन धर्म की सेवा में लगकर सांखला खानदान का नाम रोशन किया है ), शकुन ( जो अब दुनिया में नहीं है ), श्रीमती सुनीता ( जिनके एक पुत्र और एक पुत्री ने अपने जीवन को जिनशासन को सोंपा है ), श्रीमती सुषमा । पौत्र --गोलू , नीलू , रोशन ।







छोटी काकीजी ने १०.२.२००६ , शुक्रवार को छुईखदान में अंतिम साँस ली .
























Thursday, January 13, 2011

प्यार संग समर्पण और त्याग



मेरे लिए १३ जनवरी की तिथि का बहुत महत्त्व है । १३.०१.१९९४ को मेरे पिता श्री कंवरलाल जी सांखला , जिन्हें हम भायजी कहकर पुकारते थे , इस दुनिया में नहीं रहें । आज भायजी की पूण्य तिथि है । भायजी का मेरे गाँव छुईखदान में शिक्षा के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान है । सन १९५० -१९६० में जब हमारे देश में गाँव में हाई स्कूल नहीं हुआ करता था तब मेरे गाँव में ' जनता हायर सेकेंडरी ' स्कूल के स्थापना में भायजी का महत्व पूर्ण योगदान था । भायजी स्कूल के अध्यक्ष भी रहे।



माँ जिसे हम घर में 'बाई' कहकर पुकारते थे , का मैंने प्यार के कई रूप देखे थे । तब मेरे मन में बार -बार विचार आता था , आखिर क्या pyar समर्पण के बिना संभव है ? क्या समर्पण त्याग बिना हो सकता है ।



प्यार , त्याग और समर्पण को समझने में बरसों बीत जायेंगें । आओ आज मैं इसकी इक नयी परिभाषा बताऊँ --

माँ

का

पिता के प्रति

प्यार में

उतना ही

समर्पण है ,

जितना

माँ

का

बेटे

के प्रति

प्यार में

त्याग ।


भायजी ( स्व.श्री कँवर लाल जी ) और बाई ( स्व .श्रीमती धापी बाई ) की १९४२ की दुर्लभ चित्र ।