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Thursday, December 2, 2010

हक़ ,तन्हाई ,

हक़


किस -किस का शुक्रिया अदा करूँ

किस -किस का अहसान चुकाऊं

पहले ही मेरी जिन्दगी

अहसानों के बोझ से लद चुकी है ।

तुम मुझे अपना बनाकर

और ना अहसां लादो मुझपर

क्योंकि मरने के बाद भी

मेरी मिट्टी में

किसी और का हक़ होगा ।


तन्हाई


किस -किस मुकां से

गुज़रे हैं हम

कैसे बताएं आपको

मगर ,एक तन्हाई

इस कदर परेशां

किये जा रही है

क्यूँ ना बताएं आपको

पहले जब हम आपके

बहुत करीब थे , दिल तन्हां था

जब आज दिल आपके बहुत करीब है

हम तन्हां है .


7 comments:

अशोक बजाज said...

सुन्दर और बेहतरीन प्रस्तुति ,बधाई !

निर्मला कपिला said...

दोनो रचनायें दिल को छू गयी। शुभकामनायें।

अनामिका की सदायें ...... said...

वाह कितनी गहरी बात कितनी सरलता से कह दी.
बहुत खूब.

sonali said...

bahot hi accha hai!

ali said...

(१)
मिट्टी पे हक देना भी शुक्रगुजार होने सा है ! अपनों के अधिकार को स्वीकारने जैसा !

(२) ये एक अलग किस्म का ख्याल है जहाँ दिल से इतर अपना वजूद भी है और तन्हाई भी !

mera blog said...

भावपूर्ण.......मन को छू गयी आपकी कविता

Pramod Achintya said...

भावपूर्ण.......मन को छू गयी आपकी कविता