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Sunday, November 28, 2010

खामोशी , चाह , आदत

खामोशी
जब भी मेरी निगाहें
उनके निगाहों से
टकराती है ।
एक अजीब सी हलचल
दिल में होती है ।
तभी हवा का झोंका
कानों में कुछ कह जाता है
निगाहें - निगाहों की बात
समझ गए हैं ,
मगर उनके होंठ
हमारी तरह ही खामोश है ।
चाह
जब से आयी हो तुम
मेरी जिन्दगी में
हर चीज़
प्यारा लगने लगा है
हर चीज़ से
प्यार करने को
जी चाहता है ।
आदत
सारा जहां
बदल गया ,
तुम बदल गई
मैं बदल गया
नहीं बदला तो
सिर्फ मेरी आदत
पहले तुमसे
जागते हुए मिलने की
आदत थी ,
अब
ख्वाबों में मिलने की
आदत है ।



5 comments:

POOJA... said...

वाह... कितना खूबसूरत ख्वाब होगा जिसकी कविता इतनी सुन्दर है...

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (29/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

ali said...

एक,
कई बार जुबान (भाषा) को होठों की ज़रूरत नहीं होती जैसा कि इस कविता में निगाहों और खामोशी की अपनी जुबान है ! सच तो ये है कि भाषा के सामने ,ध्वनि हो या मौन,वो अपनी मनमानी कर गुज़रती है !

दो,
ये प्रेम की माया है ,उसके अपने रंग , जो सब कुछ रंग लेते हैं ,कभी खाली नहीं जाते !

तीन,
बदली तो आदत भी है वो हकीकत से ख्वाब ख्वाब हो गयी है !

दिगम्बर नासवा said...

aapki adat bhi lajawaab lagi ...
bahut khoob likha hai ..

अनुपमा पाठक said...

सुन्दर प्रस्तुति!