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Tuesday, November 23, 2010

वक्त , याद, इंतजार

वक्त
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अब
वक्त
ऐसे
गुज़र रहा है ,
मानों हम
कई
सदियों से
जी रहें हैं ।
याद
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समय का एक -एक पल
मेरी जिन्दगी को
इस तरह मिटा रही है ,
जैसे
उसकी यादों में , मै
अपने आप को
हर -पल मिटा रहा हूँ ।
इंतजार
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पहले भी कुछ इंतजार था
अब भी कुछ इंतजार है ,
पहले जिन्दगी की चाह थी
अब मौत का इंतजार है ।

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अली साहब की प्रतिक्रिया अपने आप में कविता के भाव को एक शब्द में व्यक्त करने की ताकत रखती है । मौत ना तो पूरी तरह निराशा को प्रगत करती है और ना तो पूरी तरह मौत की सच्चाई को बयां करती है , बल्की प्रकृति की निगाह में जीवन की सच्चाई भी बयां करती है ।

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5 comments:

सुमन'मीत' said...

वाह वाह क्या बात है .अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर...........

वन्दना said...

तीनो ही क्षणिकायें दिल को छू गयीं……………॥ एक से बढकर एक…………… लाजवाब चित्रण्।

ali said...

पहली कविता समय के लंबे स्केल पर जीवन को नापती हुई सी !

पर अगली दोनों कवितायेँ मृत्यु कामी शब्दों पर गढी होने के कारण निराशावादी कहूं या मृत्यु के सत्य को उद्घाटित करती हुई ! कभी यादों के बहाने और कभी इंतज़ार के सहारे

neelam chand sankhla said...

aab sabhee ko dhanywad. sunder,saty pratikriya hee aage badne kee rah jtoti hai.

Rahul Singh said...

मनोभावों को परिभाषित करते शब्‍द, शब्‍दों में ढलती कविता.