Sunday, November 14, 2010

आज का इंसान

एक इंसान
अपने जिस्म के हजारों टुकड़े करके ,
अनुभव करने की कोशिश कर रहा है ,
दर्द को ।
खोज रहा है , ईमानदारी को -
आखिर कहाँ छिपी है ,
इंसानियत !
हैरान है खोजते - खोजते
दर्द गया कहाँ ?
सोचने में मजबूर , क्या आज के इंसान के लिए
दर्द की अनुभूति आवश्यक नहीं ,
क्या अपने आप से गिरकर जीना ही -
आज के इंसान की इंसानियत है ।

2 comments:

अशोक बजाज said...

बेहतरीन प्रस्तुति .

ali said...

देह अपनी है , वेदनाएं अपनी हैं ,अनुभूतियाँ भी अपनी ही हैं सो उन्हें बाहर कहाँ ढूंढना ? इंसान बने रहना या फिर उससे नीचे गिर जाना भी अपना ही है पर कितने लोग यह जानते हैं कि नीचे गिर जाने का मतलब इंसानियत से च्युत हो जाना है !