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Sunday, November 28, 2010

खामोशी , चाह , आदत

खामोशी
जब भी मेरी निगाहें
उनके निगाहों से
टकराती है ।
एक अजीब सी हलचल
दिल में होती है ।
तभी हवा का झोंका
कानों में कुछ कह जाता है
निगाहें - निगाहों की बात
समझ गए हैं ,
मगर उनके होंठ
हमारी तरह ही खामोश है ।
चाह
जब से आयी हो तुम
मेरी जिन्दगी में
हर चीज़
प्यारा लगने लगा है
हर चीज़ से
प्यार करने को
जी चाहता है ।
आदत
सारा जहां
बदल गया ,
तुम बदल गई
मैं बदल गया
नहीं बदला तो
सिर्फ मेरी आदत
पहले तुमसे
जागते हुए मिलने की
आदत थी ,
अब
ख्वाबों में मिलने की
आदत है ।



Tuesday, November 23, 2010

वक्त , याद, इंतजार

वक्त
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अब
वक्त
ऐसे
गुज़र रहा है ,
मानों हम
कई
सदियों से
जी रहें हैं ।
याद
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समय का एक -एक पल
मेरी जिन्दगी को
इस तरह मिटा रही है ,
जैसे
उसकी यादों में , मै
अपने आप को
हर -पल मिटा रहा हूँ ।
इंतजार
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पहले भी कुछ इंतजार था
अब भी कुछ इंतजार है ,
पहले जिन्दगी की चाह थी
अब मौत का इंतजार है ।

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अली साहब की प्रतिक्रिया अपने आप में कविता के भाव को एक शब्द में व्यक्त करने की ताकत रखती है । मौत ना तो पूरी तरह निराशा को प्रगत करती है और ना तो पूरी तरह मौत की सच्चाई को बयां करती है , बल्की प्रकृति की निगाह में जीवन की सच्चाई भी बयां करती है ।

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Sunday, November 21, 2010

अपेक्षाएं और खींज

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अपेक्षाएं और खींज़

समानांतर चलती है ।

ना हम अपेक्षाएं करें

ना हमें खींज़ होगी ।

खींज़ अपेक्षा से ,

सौ गुना तेज चलती है ।

सौ प्रतिशत खींज़ से ,

मुक्ति चाहतें हैं ।

तो मन को समझाकर,

एक प्रतिशत

अपेक्षा को गति ना दे ।

Sunday, November 14, 2010

आज का इंसान

एक इंसान
अपने जिस्म के हजारों टुकड़े करके ,
अनुभव करने की कोशिश कर रहा है ,
दर्द को ।
खोज रहा है , ईमानदारी को -
आखिर कहाँ छिपी है ,
इंसानियत !
हैरान है खोजते - खोजते
दर्द गया कहाँ ?
सोचने में मजबूर , क्या आज के इंसान के लिए
दर्द की अनुभूति आवश्यक नहीं ,
क्या अपने आप से गिरकर जीना ही -
आज के इंसान की इंसानियत है ।

Friday, November 5, 2010

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

आपके जीवन में
अनगिनत दीप जल रहें है -
एक दीप आपकी आशा के
एक दीप आपकी खुशी के
एक दीप आपकी शांती के
एक दीप आपके स्नेह के
एक दीप आपके यश के
एक दीप आपके समर्पण के
एक दीप गुरू कृपा के ।
मैंने बरसों पहले , दीप - पर्व के अवसर पर
अपने घर छुईखदान में कई दीप जलाये थे ,
तभी माँ ( बाई ) मुझे पुकार कर कही थी
' नीलम ' गाय के कोठे में दीप जला आना
में गाय के कोठे में दीप जला आया
और मैंने उस दीप में चमकती रोशनी के साथ शांती देखी ,
और लौटकर आने पर
हर जलाये अपने दीप को देखे
रोशनी में चमक और वातावरण सुखद पाया ।
आपके अनगिनत दीपों में एक दीप मेरा भी , माँ के बताये राह वाला ,
जो आपके हर दीपों की रोशनी को ,
हजारों गुना बढ़ा दे ।
इसी कामना के साथ , दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ।