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Monday, October 25, 2010

एक बदनसीब इंसान

एक दर्दनाक चीख
अमीर के बंगले से टकराई ,
मगर पिघला ना सकी
उसके दिल को
कांक्रीट के दीवारों ने , रोक रखा था उसे
बुझा हुआ इंसान
छटपटाते हुए , गेट तक पहुंचा -
और तड़प -तड़प कर कहने लगा -----
मेरा बेटा मर गया है ,
कफ़न के लिए कुछ पैसे दे दो -
दया करो , रहम खाओ -
सुना तुमने -
मेरे बेटे का कसूर सिर्फ इतना था
उसने तुम्हारी फेक्टरी के बने
नकली दवा खाई थी
इक तो पैसे नहीं थे ,
दवा के लिए
जैसे -तैसे पैसे बटोरे
और उसे दवा खिलाई ,
अब मर गया है -
कफ़न के लिए पैसे कहाँ से लाऊं -
कुछ तो इंसाफ किया होता
नकली दवा में कुछ और मिलाया होता ,
मरने के बाद उसकी लाश भी ना बचती
और वह गल गया होता
कम से कम मुझ बदनसीब बाप को ;
तेरे दरवाजे पर
अपने बेटे के मौत के बदले
कफ़न ना मांगना पड़ता



3 comments:

ali said...

गुरबत और धनलोलुपता के परिप्रेक्ष्य में गहरा व्यंग !
धनपिशाच शब्द भी ऐसे ही लोगों के कारण अस्तित्व मे आया होगा !

neelam chand sankhla said...

ali sahab kee pratikriya apane aap main ek gahan vichar ko janm detee hai. bhaw purn pratikriya ke kiye dhanywad.

vijay said...

you have a great thinking power . mujhe aapki kavita bahot hi achhi lagi.