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Tuesday, August 3, 2010

विश्वास

तू नहीं मिली मुझे
जमीं पर ,
खोजता फिरू ---
अब तुझे --
मगर कहाँ ,
आसमां के उस पार
या जमीं के अंदर ,
लगता नहीं
मिलन होगा ---कभी अपना
फिर भी मुझे -
विश्वास है ----
मन में ।

2 comments:

ali said...

सशंकित मन का मिलन के विश्वास पर फोकस करने लग जाना ! अत्यंत सकारात्मक चिंतन है ! अच्छी कविता के लिए साधुवाद !

shantanu said...

aisa pratit hota hai ki ye kavita aapne kisi mahan kalpana ko leke likhi hai