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Saturday, July 10, 2010

मुकेश माथुर - श्रधांजलि

मुकेश
कोई शब्द नहीं
अनुभूति है दर्द की ,
वो गीत ही क्या ,
जिसमे कशिश नहीं ,
वो आवाज ही क्या
जो मुकेश की नहीं

मुकेश मेरा प्रिय गायक है । मुझे मुकेश के गीत बचपन से प्रिय है , क्योकि उनके गीत सिर्फ गीत नहीं बल्कि गीत मुझे प्रकृति से है जोड़ा है और जीने की कला भी दी है
हरी - भरी वसुंधरा ,है नीला -नीला ये गगन , ये किस कवि की कल्पना , ये किस कवि की कल्पना ये कौन चित्रकार है ....
प्रकृति का इतना सुंदर चित्रण मुकेश की आवाज का जादू नहीं ,तो और क्या है । मेरे गाँव छुईखदान में Dauram महोबियाजी का एक टूरिंग टाकीज था , उस टाकीज मेफिल्म चालू होने के ठीक पहले आरती का गीत बजता था और उसके ठीक पहले मुकेश का एक गीत बजता था , मेरे घर के छत से अक्सर में वो गीत सुनता था ----चल -अकेला , चल -अकेला -तेरा मेला छूटा राही , तू चल अकेला -------मुकेश ने उस गीत को इस अंदाज मे गया है , जिससे जीवन दर्शन का सहज रूप मे अहसाश हो जाता है । इस लिए मैं कहता हूँ , मुकेश के गाये गीत मेरे लिए जीवन दर्शन की एक राह है ।

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