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Tuesday, July 20, 2010

सजा

किसी की गल्ती की
इतनी सजा ,
ना दे --' नीलम '
कहीं उस बदनशीब
के पास पश्चाताप ,
के लिए -
दो वक्त ,
भी ना हो ।

2 comments:

श्याम कोरी 'उदय' said...

... बेहतरीन अभिव्यक्ति!!!

ali said...

कविता करते हुए आपकी भावुकता उभर उभर जाती है ! अपकर्म और प्रायश्चित्त पर आपके विचार सराहनीय हैं !