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Friday, February 10, 2017

Good Morning

चित्र गुगल से सभार

Wednesday, April 6, 2016

नज़रिया

नज़रिया

तूने मुझे हाथ पकड़कर
चलना सिखाया
प्रथम गुरू बनकर
गुरू से मिलाया

अब बड़ा हो गया हूँ
मुझे तेरी जरूरत नहीं
दुनियादारी सीखकर
दौड़ने लगा हूँ

दुनियादारी देखकर
थक गया हूँ
बस! अब कुछ पल
ठहरना चाहता हूँ

माँ ! अपनी गोद में लेकर
मेरी सूरत
मेरी निगाहें
बदल दे !

नहीं चाहिए मुझे
दुनिया का नूर
माँ! बस अपनी निगाहों का नज़रिया दे दे!





रिश्ता 

रिश्ता
गैरों से बनाने में
जीवन लगाते हैं
रिश्तेदार  कल काम आएंगे

वक्त की धूप ने
जीवन की चमक को
धुँधली, क्या किया?
रिश्तेदारो  ने धूप में निकलना छोड़ दिया

अपनों की उपेक्षा का पाप
सर पर और जड़ा
गैर क्या,
अपनों से रिष्ते ना बना सका

गर रिष्ता बनाना है तुझे
पहले खुद से खुद का रिष्ता बना
अपनी हमसफर से रिष्ता बना
जीवन की खुशीया देने वाली गुडि़या से रिष्ता बना

गर चाहता है और रिष्ता बनाना
‘भारत माँ’ से रिष्ता बना
धूप आने पर, धूप में आयेगी
छाँव भी खुद साथ लाएगी।


Tuesday, April 5, 2016

चलना ही जीवन है

सिर्फ चलते चले जाओ....
हर कदम मंजिल करीब आयेगी

योजना बनाकर चलते चले जाओं....
एक कदम मंजिल और करीब आयेगी

बिना स्वार्थ के चलते चले जाओ...
हर कदम सफलता की मंजिल तक पहुंचायेगा

जीवन का एक कदम दूसरों के लिए बढ़ाओं
मंजिल में पहुँचना सार्थक हो जायेगा
राजा की खरोंच

दुर्घटना में 
इंसान कुचला गया
इंसान मर गया
भीड़ चली गई

मरने वाला
कोई राजा तो नहीं था
जो उसकी चीख
मौका परस्त लोगों को
कोठे में घुंघरू के बीच
सुनाई दे जाती

चापलूस !
राजा के दर्द की अनुभूति
अपने जिस्म को छीलकर
अहसास कराने से बाज न आते

यह लोभियों का बाजार है
यहाँ हर चीज बिकती है
रंक की चीख के आगे
राजा की खरोंच दिखती है 



Monday, April 4, 2016

नया वर्ष मंगलमय हो !

जीवन की रहा में
अपने
बहुत कम नज़र
आते हैं।
अपनत्व को बनाये रख
नववर्ष की रहा में
चलते चले जाइये
अपने ही, अपने
नज़र आयेंगे।
नया वर्ष शुभ हो

माँ की याद

अपनी निगाहों से हरदम
मेरा ख़्वाब सजाने वाली,
ख़्वाबों की दुनिया को
हकीकत बनाने वाली।

25 बरस पहले देखा था तुम्हें,
आज हर पल
मेरी निगाहों में
बसने वाली।

बरसों पहले गोद में तेरी
बिताये थे चंद लम्हें,
आज तेरी यादों की गोद में
हर-पल जिये जा रहा हूँ 

बरसों पहले
तुम्हारे हाथों से
माथे को सहलाने का
एहसास है मुझे,

यकीं नहीं तो 
देख ले ‘नीलम’
मेरे सर के ऊपर हरदम
माँ के हाथ का साया है। 
 

Sunday, April 3, 2016

अपरिग्रह

जो चीज
अपनी नहीं
उसका
मोह कैसा?

हिरण

जंगल के सन्नाटे में
चारों ओर खामोशी  है
खामोषी को चीरती
हिरन की उपस्थिति
बयां कर रही है
सजीवता
जंगल की।
पैसा

पैसा जोड़ने से जुड़ता नहीं
पैसा खर्च करने से कम होना नहीं
जहां जायज हो
वहां सौ रूपये खर्च कम है
जहां जायज न हो
वहां एक रूपये का खर्च व्यर्थ है
पैसा, पैसा बनाता है
जोखिम बिना पैसा नहीं बढ़ता
बिना लेखा के प्रगति नहीं
बिना योजना के भविष्य नहीं गढ़ता।